Sunday, December 26, 2010

बिहार चुनाव: महाविजय के महानायक नीतीश



बिहार विधानसभा 2010 के चुनाव परिणाम लगभग पूरी तरह आ चुके हैं और नीतीश कुमार ने दिखा दिया है अपना करिश्मा. इन नतीजों ने जहां एक तरफ बड़े-बड़े राजनीतिक विश्लेषकों और समीक्षकों को हैरतमंद कर दिया है, वहीँ दूसरी तरफ राष्ट्रीय और प्रादेशिक राजनीति के धुरंधरों की बोलती बंद कर दी है.

जी हां, बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से दो तिहाई से भी ज्यादा बहुमत लाकर नीतीश कुमार ने ये साबित कर दिया है कि उनकी चलाई विकास की गाड़ी बिहार की पटरी पर न सिर्फ सरपट दौड़ने वाली है बल्कि उसने तो सभी विरोधी दलों को भी ऐतिहासिक रूप से धूल चटा दी है.

इस चुनावी नतीजे ने 1977 के रिकॉर्ड को भी तोड़कर रख दिया है...सच तो है कि इस चुनाव ने बिहार के 58 साल के चुनावी इतिहास को बदलकर रख दिया है...बिहार के सियासी इतिहास में पहली बार किसी दल या गठबंधन को ऐसी सफलता मिली है...
1977 के ऐतिहासिक चुनाव के बाद महज दो बार राजनीतिक दलों ने 150 के आंकड़े को पार किया है...कांग्रेस ने 1985 में 196 सीटों पर जीत दर्ज की थी...उसके बाद लालू यादव ने 1995 के विधानसभा चुनाव में 167 सीटों पर जीत दर्ज की थी...लेकिन इसके बावजूद कोई भी दल या गठबंधन एनडीए की तरह ऐसी गगनचुंबी कामयाबी का शिखर नहीं चूम पाया था ...

1995 के बाद किसी भी दल या गठबंधन को 150 से ज्यादा सीट नहीं मिली है. यहाँ तक कि 2005 के विधानसभा चुनाव में खुद एनडीए गठबंधन को भी कुल 143 सीटों पर ही सफलता मिली थी...लेकिन इस बार के चुनाव नतीजे ने पहले के सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त करके रख दिया....

पिछले पांच साल तक लगातार विकास की बात करते रहने वाले नीतीश ने इस चुनावी महाविजय से ये साबित कर दिया है कि अब उनका कद एक क्षेत्रीय स्तर के नेता से बढ़कर राष्ट्रीय स्तर का हो चुका है. बिहार की गद्दी पर तीसरी बार बैठने वाले ये वही नीतीश कुमार हैं जिनको पहली बार सन 2000 में बहुमत न जुटा पाने की वजह से महज 7 दिनों तक ही बिहार का मुख्यमंत्री बनना नसीब हो पाया था. उस वक़्त किसी को सपने में भी ये गुमान नहीं हुआ होगा कि एक दिन इन्हें सूबे की इसी गद्दी पर ऐतिहासिक बहुमत के साथ लगातार दूसरी बार गद्दीनशीं होने का मौका बिहार की जनता देगी.

नीतीश के नेतृत्व में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने उम्मीद से कहीं ज्यादा सीटें हासिल की हैं लेकिन एनडीए की इस जीत के असली सूत्रधार हैं नीतीश कुमार। आइये, महाविजय के इस महानायक की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर भी एक नज़र डालते हैं.

1974-1977 के दौरान जे. पी. आंदोलन में लालू के साथ सक्रिय भूमिका निभाने वाले नीतीश ने इस आन्दोलन से अपने राजनीतिक जीवन के सफर की शुरुआत की थी. इसी दौरान नीतीश आपातकाल में जेल भी गए और सन 1985 में पहली बार बिहार विधानसभा के लिए एक निर्दलीय विधायक के रूप में चुनकर गए और उसके बाद 1989 में लालू और रामविलास सरीखे अपने मित्रों के साथ पहली बार संसद सदस्य के रूप में चुनकर जाने के बाद नीतीश ने फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और 2004 आते-आते नीतीश 6 बार सांसद चुने जा चुके थे.इसके अलावा केन्द्र सरकार में कई महत्वपूर्ण पद सम्हालने के अलावा नीतीश ने रेल मंत्री बनने के बाद अपनी महत्वपूर्ण पहचान बनाई.

वक्त ने करवट बदली,पुराने दोस्त पहले मतभेदी फिर विरोधी बन बैठे और आखिरकार नीतीश लालू और रामविलास सरीखे अपने पुराने साथियों से अलग हो गए और जार्ज और शरद यादव के साथ मिलकर थाम लिया एनडीए का दामन.

सेकुलर और ईमानदार छवि के मानेजाने वाले नीतीश को अपनी इस नई राह पर कम आलोचनाओं का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन नीतीश ने किसी पक्के राजनेता की तरह कांटो के बीच से भी अपनी राह निकाल कर सबकी बोलती बंद कर दी.इस चुनाव के पहले भी जब चुनाव प्रचार को लेकर नरेन्द्र मोदी और वरुण गाँधी जैसे धुर हिन्दुवादी नेताओं के बिहार दौरे पर आने की बात बीजेपी के नेताओं ने की तो नीतीश ने अपनी सेकुलर छवि का ध्यान रखते हुए इन दोनों में से किसी भी नेता का बिहार दौरा रुकवा दिया.नीतीश के इस कदम पर गठबंधन बिखराव की कगार पर आ गया था मगर फिर भी ये नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग, आत्म-विश्वास और विकास का ही कमाल था जिसकी बदौलत जनता ने नीतीश को सर-आँखों पर बिठाया और नीतीश ने अपने इस दांव से एक बार में ही न सिर्फ अपनी पार्टी और गठबंधन में अपने आलोचकों की बोलती बंद कर दी बल्कि खुद का स्तर मोदी और वरुण गाँधी से कहीं ऊँचा कर दिखाया.

नीतीश की इस जीत के कई मायने निकलते हैं और ऐसा मानने में कोई बुराई नहीं है की नीतीश अब प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन सकने लायक नेताओं में शुमार हो गए हैं.विकास की जिस नाव पर सवार होकर देश के पश्चिमी राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी बीजेपी की अगली कतार के प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से एक हैं तो वहीँ देश के पूर्वी राज्य बिहार से मोदी को इंकार का हाथ दिखने वाले नीतीश भी विकास के ही रथ पर सवार हो कर एनडीए के एक अलग दावेदार बनकर सामने आये हैं.जीत की खुशी में भी गुमान न दिखाते हुए नीतीश भले ही आज प्रधानमंत्री पद की किसी महत्वाकांक्षा से इंकार कर रहे हों मगर दिल ही दिल में हाँ की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकते.

1 comment:

खरी खोटी said...

bahut accha likha hai aapne, par thodi late kar di, phir bhi item accha hai