
नई दिल्ली. एक ओर जहाँ अंग्रेजी व अन्य भारतीय भाषाओं के समाचार पत्र फल-फूल रहे हैं वहीं संस्कृत का दुनिया का अकेला समाचार पत्र ‘सुधर्मा’ अपना अस्तित्व बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहा है. कर्नाटक के मैसूर से प्रकाशित होने वाला ‘सुधर्मा’ अगले सप्ताह अपने 42वें साल में प्रवेश कर रहा है.
मैसूर से प्रकाशित होने वाले इस समाचार पत्र के सम्पादक के.वी.सम्पत कुमार का कहना है कि ' कोई भी प्रादेशिक या केन्द्रीय निकाय हमारी मदद के लिए आगे नहीं आया और निजी क्षेत्र के विभिन्न संगठनों का हाल भी अलग नहीं है. ' फिलहाल इस समाचार पत्र के 2,000 ग्राहक हैं.
जयालक्ष्मी हिंदी, तमिल, कन्नड़, अंग्रेजी व संस्कृत भाषाओँ की अच्छी जानकार हैं.जब उनसे पूछा गया कि वह बिना किसी मदद के एक 'मृत-भाषा' में समाचार पत्र क्यों निकाल रहे हैं तो इस पर कुमार की पत्नी जयालक्ष्मी ने कहा,
' कौन कहता है संस्कृत मर गई है ? हर सुबह लोग श्लोकों का उच्चारण करते हैं, पूजा करते हैं, विवाह, बच्चे के जन्म और मृत्यु सहित सारे संस्कार संस्कृत में सम्पन्न होते हैं. संस्कृत की वजह से ही भारत एकजुट है. यह हमारी मातृभाषा है जो अपने में कई भाषाओं को समेटे है. इसका विकास हो रहा है और अब तो आईटी व्यवसायी भी कहते हैं कि यह भाषा उपयोगी है. '
कुमार कहते हैं कि उनके पिता पंडित वरदराज आयंगर ने 15 जुलाई, 1970 को इस समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया था. इतना ही नहीं श्री आयंगर ने ही 1990 में भारत के तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री आई. के. गुजराल को संस्कृत की महत्ता समझाकर आकाशवाणी पर संस्कृत के समाचार पाठन की शुरुआत करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी. के. वी. सम्पत कुमार ने बताया, ' जब 1990 में श्री आयंगर की मृत्यु हुई तो उससे पहले उन्होंने कुमार से वादा लिया था कि वो किसी भी तरह से सुधर्मा को जारी रखेंगे. अब यह दैनिक एक मिशन की तरह उसी जुनून और समर्पण के साथ जारी है. आर्थिक तंगी के बावजूद कुमार कहते हैं कि - मैं अपने आखिरी वक्त तक इसका प्रकाशन करता रहूंगा. '
एक रुपये मूल्य में मिलने वाले इस समाचार पत्र में ज्यादातर लेख वेदों, योग, धर्म पर केंद्रित होते हैं. इसके साथ राजनीति, संस्कृति व अन्य विषयों पर भी लेख होते हैं. कुमार और उनकी पत्नी ही इस समाचार-पत्र के वितरकों व प्रकाशकों की भूमिका निभा रहे हैं. आज के दौर में जहाँ कोई भी अखबार 3.50 - 4.0 रुपये से कम का नहीं है, वहीँ आप सुधर्मा को मात्र 300 रुपयों में ही पूरे साल घर बैठे मंगवा सकते है. इसके साथ ही इसका इंटरनेट संस्करण ( http://sudharma.epapertoday.com/ ) भी शुरू हो चुका है. संस्कृत को विश्व की सबसे प्राचीन एवं अधिकतम भाषाओँ की जननी माना जाता है ऐसा 'मैक्समूलर' जैसे प्रकाण्ड पश्चिमी विद्वान भी मानते थे.
मैं समझता हूँ कि संकट की इस घड़ी में यदि हम भारतवासी अपनी इस सबसे प्राचीन देव एवं मातृभाषा की मदद को आगे नहीं आयेंगे तो इससे बड़ी लज्जाजनक बात और कोई नहीं हो सकती. आशा है हम इस गरिमामय संस्कृत-पत्र को मरने नहीं देंगे और आगे आकर इसकी मदद को हाथ बढ़ाएंगे.
Sudharma link :- http://sudharma.epapertoday.com/
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