जी हां, बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से दो तिहाई से भी ज्यादा बहुमत लाकर नीतीश कुमार ने ये साबित कर दिया है कि उनकी चलाई विकास की गाड़ी बिहार की पटरी पर न सिर्फ सरपट दौड़ने वाली है बल्कि उसने तो सभी विरोधी दलों को भी ऐतिहासिक रूप से धूल चटा दी है.
1995 के बाद किसी भी दल या गठबंधन को 150 से ज्यादा सीट नहीं मिली है. यहाँ तक कि 2005 के विधानसभा चुनाव में खुद एनडीए गठबंधन को भी कुल 143 सीटों पर ही सफलता मिली थी...लेकिन इस बार के चुनाव नतीजे ने पहले के सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त करके रख दिया....
नीतीश के नेतृत्व में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने उम्मीद से कहीं ज्यादा सीटें हासिल की हैं लेकिन एनडीए की इस जीत के असली सूत्रधार हैं नीतीश कुमार। आइये, महाविजय के इस महानायक की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर भी एक नज़र डालते हैं.
वक्त ने करवट बदली,पुराने दोस्त पहले मतभेदी फिर विरोधी बन बैठे और आखिरकार नीतीश लालू और रामविलास सरीखे अपने पुराने साथियों से अलग हो गए और जार्ज और शरद यादव के साथ मिलकर थाम लिया एनडीए का दामन.
सेकुलर और ईमानदार छवि के मानेजाने वाले नीतीश को अपनी इस नई राह पर कम आलोचनाओं का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन नीतीश ने किसी पक्के राजनेता की तरह कांटो के बीच से भी अपनी राह निकाल कर सबकी बोलती बंद कर दी.इस चुनाव के पहले भी जब चुनाव प्रचार को लेकर नरेन्द्र मोदी और वरुण गाँधी जैसे धुर हिन्दुवादी नेताओं के बिहार दौरे पर आने की बात बीजेपी के नेताओं ने की तो नीतीश ने अपनी सेकुलर छवि का ध्यान रखते हुए इन दोनों में से किसी भी नेता का बिहार दौरा रुकवा दिया.नीतीश के इस कदम पर गठबंधन बिखराव की कगार पर आ गया था मगर फिर भी ये नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग, आत्म-विश्वास और विकास का ही कमाल था जिसकी बदौलत जनता ने नीतीश को सर-आँखों पर बिठाया और नीतीश ने अपने इस दांव से एक बार में ही न सिर्फ अपनी पार्टी और गठबंधन में अपने आलोचकों की बोलती बंद कर दी बल्कि खुद का स्तर मोदी और वरुण गाँधी से कहीं ऊँचा कर दिखाया.
नीतीश की इस जीत के कई मायने निकलते हैं और ऐसा मानने में कोई बुराई नहीं है की नीतीश अब प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन सकने लायक नेताओं में शुमार हो गए हैं.विकास की जिस नाव पर सवार होकर देश के पश्चिमी राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी बीजेपी की अगली कतार के प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से एक हैं तो वहीँ देश के पूर्वी राज्य बिहार से मोदी को इंकार का हाथ दिखने वाले नीतीश भी विकास के ही रथ पर सवार हो कर एनडीए के एक अलग दावेदार बनकर सामने आये हैं.जीत की खुशी में भी गुमान न दिखाते हुए नीतीश भले ही आज प्रधानमंत्री पद की किसी महत्वाकांक्षा से इंकार कर रहे हों मगर दिल ही दिल में हाँ की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकते.