Friday, August 8, 2014

खतरनाक 'इबोला' से बचाव के लिए इन दवाओं से है उम्मीद

40 साल पहले साल 1976 में अफ्रीका में पहली बार इबोला संक्रमण का पता चलने के बाद से अब तक दुनिया यही मानती आयी है कि इबोला वायरस के संक्रमण का कोई इलाज नहीं है. अब तक इबोला से बचने का कोई टीका या वैक्सीन भी हमारे पास मौजूद नहीं था. इसी वजह से विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इबोला वायरस को बेकाबू करार दे दिया है. 
लेकिन ना-उम्मीदी के इस दौर में इलाज की उम्मीद अब उन दवा बनाने वाली कंपनियों से मिली है जो पिछले कई बरसों से इबोला के इलाज़ पर काम करती रही हैं और अब ऐसा लगता है जल्द ही उन दवाओं का इंसानी प्रयोग संभव हो पायेगा क्योंकि खतरनाक ढंग से बढ़ते इबोला को देखकर अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अगले हफ्ते उन दवाइयों के इंसानी उपयोग किये जाने के मुद्दे पर सार्थक बहस का वादा किया है जिन्हें अभी तक एक बार भी इंसानों पर टेस्ट नहीं किया गया है. यानी इलाज़ की संभावनाओं पर अब पहल होनी शुरू हो चुकी है. इबोला के इलाज की जानकारी से पहले इबोला से जुड़े नीचे दिये कुछ जानकारी भरे तथ्यों पर भी नज़र डाल लीजिये.

इंसानों के अलावा जानवर भी फैलाते हैं इबोला 
इंसानों के अलावा जानवरों के जरिए भी इबोला का संक्रमण होता है. चमगादड़ों को इबोला की सबसे बड़ी वजहों में से एक माना गया है. इसलिए, किसी भी अनजान और बाहरी जानवर से बचिए और मरे हुए जानवरों के शरीर के पास जाने की कोशिश न करें. बेहतर है ऐसी किसी स्थिति में स्थानीय स्वास्थ्य सेवाओं की मदद लें.

संक्रमित व्यक्ति के खून के अलावा पसीने से भी फैलता है इबोला 
इसका संक्रमण, केवल संक्रमित व्यक्ति के खून से या उस व्यक्ति को छूने से ही नहीं फैलता है बल्कि संक्रमित मरीज के पसीने से भी यह वायरस फैल सकता है और तो और मरीज की मौत के बाद भी वायरस सक्रिय रहता है. सबसे अहम बात ये है कि फ्लू के इन्फेक्शन की तरह यह सांस के जरिए नहीं फैलता बल्कि इसका संक्रमण तभी होता है जब कोई व्यक्ति मरीज या मरीज के मृत शरीर से सीधे संपर्क में आता है.
इसी कारण, अस्पतालों में इसके फैलने की सबसे बड़ी वजह ये होती है कि मरीज की मौत के बाद जब उसके रिश्तेदार वहां पहुंचते हैं तो अंतिम संस्कार से पहले संक्रमित व्यक्ति के शव को छूने लगते हैं. संक्रमण के लिए इतना काफी होता है.
यही वजह है कि अफ्रीका के जिन देशों में इबोला फैला हुआ है, वहां की सरकारें लोगों को अंतिम संस्कार के लिए शव नहीं दे रही हैं. 

इबोला से बचाव के लिए क्या है उम्मीद की किरण  
इबोला के इलाज के लिए फिलहाल दुनिया की नजर उन टीकों और इंजेक्शन पर होगी जो कई बरस की मेहनत के बाद कुछ कंपनियों ने तैयार किये हैं. कुछ ने तो बंदरों पर उसके सफल प्रयोग भी पूरे कर लिए हैं. बाज़ार में उतारने से पहले उन्हें सिर्फ इसे इंसानों पर प्रयोग की अनुमति का इंतजार है और इबोला के बढ़ते कहर की वजह से ऐसा लगता है कि अमेरिका और विश्व स्वास्थ्य संगठन जल्द ही उन्हें इसकी इजाजत दे देंगे क्योंकि इन दवाओं के अब तक के परिणाम आशाजनक रहे हैं.

कौन-कौन सी दवाएं करेंगी इबोला का इलाज 
इलाज के लिए दवा बनाने वाली कंपनी के तौर पर सबसे पहला नाम आता है एक बहुराष्ट्रीय कंपनी मैप बायोफार्मास्यूटिकल का जिसने तकरीबन एक दशक पहले ही इबोला के टीके पर काम शुरू कर दिया था. इसकी बनायी ये अनूठी दवा दवा मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का मिक्स है. 
इसमें ऐसे प्रोटीन हैं जो सीधे इबोला वायरस पर असर करते हैं और सबसे रोचक बात ये है कि इबोला के विषाणुओं से लड़ने के लिए इन प्रोटीन्स को बायोइंजीनियरिंग से बनाये गये तंबाकू के पौधे से निकाला जाता है. इस कंपनी ने बड़ी मेहनत के बाद बायोइंजीनियरिंग तकनीक की मदद से तंबाकू के ऐसे पौधे तैयार किये हैं जिनसे ये खास तरह का प्रोटीन निकाला जा सकता है.

इसी कड़ी में मैप बायोफार्मास्यूटिकलने  पिछले साल इस वैक्सीन का इबोला से संक्रमित बंदरों पर परीक्षण पूरा कर लिया है और उससे मिले उत्साहजनक परिणामों के मुताबिक इस दवा को देने के 104 से 120 घंटे के अंदर 45 फीसदी बंदर इबोला की बीमारी से ठीक हो गए. 

इसी तरह टेकमिरा नाम की कंपनी भी इबोला की दवा पर काम कर रही है. इसका इंजेक्शन आरएनए इंटरफेरेंस नाम की जेनेटिक तकनीक पर आधारित है. इसमें इंजेक्शन के माध्यम से दवा मरीज के अन्दर जाकर वायरस के डीएनए पर हमला करती है बीमारी से बचाने में मदद करती है.

इसके अलावा एक और कंपनी प्रोफेक्टस बायोसाइंसेस ने भी इबोला की वैक्सीन का बंदरों पर टेस्ट किया जिसका नतीजा काफी अच्छा आया है.

अब तक जब भी इबोला का कहर पैदा हुआ है, हर बार कुछ तय सावधानियां और तौर-तरीके अपना कर इबोला को महमारी बनने से रोकने में सफलता पायी जा चुकी है. साल 2012 में भी युगांडा में अस्पताल के आसपास असुरक्षित आवाजाही रोक कर और दूसरी सावधानियों के जरिये इबोला संक्रमण को रोका गया था लेकिन ये पहली बार है जब लाइलाज समझी जाने वाली इस बीमारी के इलाज को लेकर आशा की सार्थक किरण के रूप में कई तरह की दवाओं का नाम सामने आया है. उम्मीद है अब इबोला का डर जल्द ही दूर होगा. 

*** ( यह लेख दिनांक 07.08.2014 को प्रभात-खबर, रांची में प्रकाशित हो चुका है ).
इसकी लिंक यहां दी जा रही है.

ब्रिटिश हुकूमत की पैदाइश 'राज्यपाल' के पद की इस देश को जरूरत क्यों है !

देश की राजनीति में फिलहाल मिजोरम की राज्यपाल कमला बेनीवाल की बर्खास्तगी पर बवाल मचा हुआ है. गौरतलब है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गुजरात के मुख्यमंत्री रहते वक्त बेनीवाल वहां की राज्यपाल थीं और उस दरमियान दोनों के संबंध मधुर नहीं थे. इस मामले को लेकर एक तरफ जहां कांग्रेस समेत पूरा विपक्ष इसे सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उल्लंघन और राजनीतिक बदले की भावना से की गई कार्रवाई करार दे रहा है वहीं दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी की भाजपा सरकार ने बेनीवाल को हटाने के पीछे बेनीवाल की विदाई के पीछे राजस्थान के जमीन घोटाले और सरकारी हवाई जहाज के निजी इस्तेमाल जैसे भ्रष्टाचार और सरकारी सुविधाओं के दुरुपयोग के आरोपों को वजह बताया है.
मिजोरम की राज्यपाल कमला बेनीवाल के रिटायरमेंट में महज दो महीने बचे थे. लेकिन सरकार ने उसके पहले ही उन्हें राजभवन से चलता कर दिया है.
राज्यपाल को लेकर इस देश में विवाद होना कोई नई बात नहीं है. साल 1967 के बात राज्यपाल के पद और उसके उपयोगों और दुरुपयोगों को लेकर विवाद होते ही रहे हैं. ऐसे में ये सवाल अहम हो जाता है कि अंग्रेजों के द्वारा बनाये गए पद की आज के दौर में क्या अहमियत बची है और जब इस पद की गरिमा ही नहीं बच पा रही है तो इसे समाप्त क्यों न कर दिया जाये !

भारत में राज्यपाल के पद के सृजन का इतिहास

भारत में राज्यपाल के पद की अवधारणा ब्रिटिश राज के समय अस्तित्व में आई थी. उन्नीसवीं सदी के अंत तक ब्रिटिश -भारत में देश आठ प्रांतों में बंटा हुआ था, जिसका प्रशासन राज्यपाल या उप-राज्यपाल करते थे. उसके बाद सन 1905-1911 में बंगाल विभाजन के दौरान असम और पूर्वी बंगाल जैसे दो और राज्यों का जन्म हुआ, जो उप-राज्यपाल द्वारा शासित किये जाते थे. 1947 में देश की आजादी के बाद भी हमारे नीति-निर्माताओं के द्वारा इस पद को बनाये रखा गया. 1950 से 1967 तक देश के राज्यों में कांग्रेसी सरकारें ही सत्ता में थी. नतीजतन राज्यपाल की नियुक्ति से पहले सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार-विमर्श किये जाने की औपचारिक प्रथा का निर्वाह किया जाता था लेकिन सन 1967 के चुनावों में जब कुछ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ, तब इस प्रथा को समाप्त कर दिया गया और मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किए बिना राज्यपाल की नियुक्ति की जाने लगी. बस, इसी समय से राज्यपाल के गरिमामय पद की महत्ता अपना अर्थ खोने लगी.

राज्यपाल का पद और उससे जुड़े कुछ प्रमुख विवाद : 

राज्यपालों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. 1967  के बाद से लगभग हर दौर में ऐसे विवाद कायम रहे हैं और सत्ता में बैठी सरकारें और विपक्ष एक-दूसरे पर इस पद के दुरुपयोग को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं. देश की कई प्रमुख सरकारों और उनके द्वारा बनाये गए राज्यपालों के दौर में हुए विवाद और उन राज्यपालों के ऊपर लगे आरोपों के अलावा केंद्र में बैठी तात्कालिक सरकारों के द्वारा इस पद के दुरुपयोग को आरोपित करते कई प्रमुख तथ्य इस बात को दिखाते हैं कि किस तरह से बीते कुछ दशकों में इस पद उपयोग अपने-अपने लाभ के लिए सरकारें और उस पद पर आसीन रहे लोग करते रहे हैं. विशेषरूप से आपातकाल की समाप्ति और जनता पार्टी की सरकार के बाद दुबारा सत्ता में आईं इंदिरा गांधी के दौर में जब राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं तो उन्होंने ऐसे राज्यपाल नियुक्त करने की परम्परा शुरू की जो कि सक्रिय पार्टी कार्यकर्ता की तरह से काम करने वाले हों. यानि वो राज्यपाल के निष्पक्ष और संवैधानिक पद पर रहते हुए भी सत्ताधारी सरकार के विश्वासपात्र बने रहें. बाद में कांग्रेस द्वारा शुरू किये गए इसी तर्ज पर दूसरे दल भी चलने लगे.

ऐसे ही कुछ विवादों पर एक नज़र डालते हैं ताकि ये निर्णय किया जा सके कि इस देश में राज्यपाल का पद अब कितना उपयोगी रह गया है  -

हरियाणा : 

राज्यपालों के पक्षपातपूर्ण रवैये को दर्शाती घटनाओं में से एक घटना हरियाणा की है. ये उस दौर की शुरुआत थी जिसमें केंद्र की सरकार राज्यपालों को अपने फायदे और विरोधियों के नुकसान के लिए इस्तेमाल करने लगी थी. इसी कड़ी में, हरियाणा में देवीलाल के साथ भी राज्यपाल ने सत्ता के आदेश पर अन्याय किया. उस समय हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल गणपतराव देवजी तपासे ने देवीलाल के पास ज्यादा विधायक होने के बावजूद उन्हें सरकार बनाने का मौका  नहीं दिया और एक तरफ़ा निर्णय लेते हुए राज्य में देवीलाल की जगह भजनलाल की सरकार बनवा दी थी. इस पक्षपातपूर्ण घटना पर उस वक़्त देवीलाल राज्यपाल गणपतराव से इतने नाराज हो गए थे कि उन्होंने  गुस्से में आकर तपासे की गर्दन ही पकड़ ली थी. ताऊ का ये गुस्सा सिर्फ मानवीय संवेदना की उपज नहीं था बल्कि लोकतान्त्रिक अधिकारों के हनन के विरोध का भी द्योतक था.

आंध्र-प्रदेश :

उसी दौर में इन नामों में आंध्र-प्रदेश के राज्यपाल रामलाल भी बहुत चर्चित रहे थे. दरअसल, आन्ध्र-प्रदेश से इंदिरा गांधी का विशेष लगाव था क्योंकि जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद वे आन्ध्र में ही मेडक से लोकसभा का चुनाव जीती थीं. उस वक़्त राज्य में कांग्रेस का सफाया हो चुका था और एन.टी. रामाराव सत्ता में आ चुके थे. इंदिरा गांधी के लिए एन.टी.आर. का आंध्र की सत्ता में आना एक खतरनाक संकेत था क्योंकि उस ज़माने में रामाराव की लोकप्रियता और महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ चुकी थी कि वो खुद के प्रधानमंत्री बनने के सपने तक देखने लगे थे. एन. टी. रामाराव के इस डर से निपटने के लिए इंदिरा गांधी ने हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रामलाल को 1984 में आंध्र-प्रदेश का राज्यपाल बना कर भेजा. नतीजतन आंध्र-प्रदेश में कांग्रेस ने राजनीतिक तोड़-फोड़ शुरु कर दी. जरूरी बहुमत होने के बावजूद रामाराव की सरकार बर्खास्त कर दी गई और आंध्र-प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

कर्नाटक :

1. ऐसा ही कुछ काम कर्नाटक में राज्यपाल बने पी. वैंकटसुबैय्या ने भी किया. उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई को विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका ही नहीं दिया. विरोधस्वरूप उनके इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. उच्चतम न्यायालय ने वैंकटसुबैय्या इस कदम को गलत ठहराते हुए न सिर्फ उसकी निंदा की थी बल्कि ये भी कहा कि बहुमत परीक्षण सदन में ही किया जाना चाहिए. कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक था और इस नजीर का आज तक पालन किया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट का यह महत्वपूर्ण फैसला आने के बाद राज्यपाल पी. वैंकट सुबैय्या को शर्मिंदगी की वजह से अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.

2. धुर कांग्रेसी नेता और कर्नाटक के राज्यपाल रहे हंसराज भारद्वाज भी लगातर विवादों में घिरे रहे हैं. जनता पार्टी के शासन के दौरान यही हंसराज भारद्वाज श्रीमती इंदिरा गांधी व संजय गांधी के वकील हुआ करते थे. तत्कालीन शाह आयोग के सामने इन्होंने ही दोनों की पैरवी की थी. केंद्र में कानून-मंत्री रहते हुए उनके ही कार्यकाल में कोर्ट द्वारा बोफोर्स कांड के मुख्य आरोपी क्वात्रोची के सील किए गए बैंक खातों को मुक्त किया गया था जिसकी वजह से क्वात्रोची अपने उन खातों से पैसा निकाल पाया था. भारद्वाज ने राज्यपाल के रूप में विवादास्पद रूप से कर्नाटक की विधानसभा भंग करके केंद्र सरकार को वहां राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की सिफारिश करते अपनी रिपोर्ट भेजी थी मगर विपक्ष के दबाव और विरोध के कारण ऐसा हो नहीं.

उत्तर-प्रदेश :

1. वफ़ादारी निभाने की कड़ी में ही इंटेलीजेंस ब्यूरो यानि आईबी के पूर्व निदेशक रहे टी.वी. राजेश्वर को भी सत्तारुढ़ दल कांग्रेस के साथ निष्ठा अदा करने का लाभ मिला. उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया था. उस ज़माने में ये खबर आम थी कि जब इंदिरा गांधी के फार्म हाउस पर सी.बी.आई. का छापा पड़ा था तो उन्हें राजेश्वर की ही बदौलत उसकी पूर्व सूचना मिली थी. संकट के उस वक्त पर की गई उनकी इस सेवा को इंदिरा के परिवार ने कभी नहीं भुलाया. फलस्वरूप न सिर्फ उन्हें आईबी का प्रमुख बनाया बल्कि बाद में उत्तर प्रदेश का राज्यपाल भी बनाकर उनकी सेवा का पुरस्कार दिया गया था.

2. रोमेश भंडारी ने भी उत्तर-प्रदेश का राज्यपाल रहते हुए अपने कार्यकाल में विवादों को जन्म दिया. उन्होंने कल्याण सिंह को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने का मौका न देकर उनकी जगह जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया. उस समय लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता के तौर पर जगदम्बिका पाल का नाम महज 24 घंटे के मुख्यमंत्री के तौर पर दर्ज हो गया क्योंकि राज्यपाल भंडारी के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती पर कोर्ट ने कर्नाटक मामले की तर्ज पर कहा था कि राजभवन जैसी जगह राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाई जानी चाहिए और सरकार बनने के बाद उसके बहुमत की परीक्षा सदन में ही की जानी चाहिए.

बिहार :

बिहार का राज्यपाल बनने पर बूटा सिंह ने तो एक कदम आगे जाकर नीतीश कुमार की अगुआई में उनके  सरकार बनाने के दावे को न सिर्फ खारिज कर किया बल्कि इसके साथ ही विधानसभा भंग करने तक की सिफारिश कर दी. उनके इस कदम की जमकर आलोचना हुई और उनके निर्णय को भी सुप्रीम कोर्ट ने गलत ठहरा दिया. चौतरफा आलोचना और किरकिरी के बाद किसी तरह बूटा सिंह ने इस्तीफा दिया था. बूटा सिंह के कार्यकाल के दौरान राजभवन पर राज्य में अफसरों की पोस्टिंग, स्थानांतरण के अलावे शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर तमाम सरकारी कामों में उनकी तरफ से उनके बेटे के द्वारा अवैध धन-कमाने के कई संगीन आरोप भी लगते रहे थे.

                       इन उदाहरणों से ये साफ़ नज़र आता है कि आज के दौर में राज्यपाल का पद अपने संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप कार्य करने की जगह सत्ताधारी दलों के नफे-नुकसान के लिए इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में देश में इस पद की उपयोगिता पर सार्थक वाद की जरूरत है. राज्यों की राजधानियों की सैकड़ों एकड़ की भूमि पाकर बने राजभवनों से ज्यादा हमें अच्छे अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों की जरूरत है. जनता की मेहनत के जिन करोड़ों रुपयों का अपनी सुविधा और हवाई घुमक्कड़ी में बेजां इस्तेमाल का आरोप इन लोगों पर लग रहा है क्या उसके लिए बोलने का इस देश की जनता को हक नहीं है !

                     अंग्रेज़ इस देश को तो सन 1947 में ही छोड़कर चले गए थे फिर आज तक हम उनके द्वारा, उनके फायदे और उनकी जरूरत के हिसाब से बनाये गए ऐसे किसी पद को क्यों ढो रहे हैं ? वैसे भी, राज्यपाल केवल राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है और राज्यपाल की शक्तियां राष्ट्रपति में ही समाहित रहती हैं. ऐसे में, विकल्प के रूप में संविधान के शीर्ष रक्षक के तौर पर या तो केवल राष्ट्रपति को ही सभी राज्यों का पालक माना जा सकता है या फिर देश में मौजूद दर्जनों राज्यपालों की जगह पर पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के राज्यों को रेखांकित कर राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में महज 4 राज्यपालों के पद का सृजन करके भी देश में राज्यपाल की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है. ये मुद्दा विवेचना का है और ऐसा लगता है कि आज नहीं तो कल देश को अब इस पर सोचना होगा वरना इसी तरह से विवाद होते रहेंगे और सत्ताएं इस पद का दुरुपयोग कर इसका मजाक बनाती रहेंगी.

*** ( यह लेख आज दिनांक 08.08.2014 को प्रभात-खबर, रांची में प्रकाशित हो चुका है ).
इसकी लिंक यहां दी जा रही है.
http://www.prabhatkhabar.com/news/137841-Governor-Kamla-Beniwal,-dismissal,-organically,-Prime-Minister-Narendra-Modi.html

Monday, April 21, 2014

बिहार के गिरिराज का ‘नमो’ और ‘सुमो’ कनेक्शन

बिहार की राजनीति में पिछले डेढ़-दो साल में कभी सत्ता के साथी रहे बीजेपी-जद(यू) के गठजोड़ में क्रमशः क्षरण होता गया और इस क्षरण में वैसे तो कई बड़े और छोटे नाम वाले नेताओं ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई मगर सबसे ज्यादा प्रमुख रूप से कुख्यात होने वालों में एक तरफ जद(यू) से श्री शिवानंद तिवारी तो दूसरी तरफ बीजेपी से श्री गिरिराज सिंह रहे हैं.

चूंकि ये विषय श्री गिरिराज सिंह पर आधारित है तो उनपर ही यह आलेख केंद्रित रहेगा.

जहां तक बिहार की राजनीति का प्रश्न है तो आज़ादी के बाद बाबू श्री कृष्ण सिंह से लेकर  1990 की शुरुआत तक बिहार की गद्दी पर प्रमुखतया अगड़े ही काबिज़ रहे जिनमें सभी सवर्ण जातियां शामिल हैं.

ब्राह्मण के रूप में श्री जगन्नाथ मिश्र आखिरी अगड़े नेता थे जो श्री लालू प्रसाद यादव के पहले सत्ता सम्हाल रहे थे.

1990 में लालू को वी.पी. सिंह के साथ का फायदा हुआ और आरक्षण और मंडल की आग ने बिहार की राजनीति को खुलकर और पूरी तरह से जातिगत रण-भूमि में बदल दिया जिसका असर ये हुआ कि लालू इसे अपना जादू और अदृश्य जिन्न की ताकत बताते हुए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में लगभग 15 बरस तक रहे. उनके बाद भाजपा के कंधे पर सवार होकर श्री नीतीश कुमार आये जो ‘कुर्मी’ यानि पिछड़े हैं और अभी तक अपने को विकास-पुरुष बताते हुए सत्ता पर काबिज़ हैं.

कुल हिसाब लगाया जाये तो पिछले 24 बरस से बिहार में अगड़ी जाति से कोई भी नेता इस राज्य के मुख्य-मंत्री की कुर्सी के आस-पास भी फटक नहीं पाया है. जाहिर है इसकी कसक बिहार की अगड़ी जाति और उसकी नुमाइंदगी करने वाले नेताओं में है.

इस राज्य में अधिकांश जनसंख्या यादव, पिछडों और राजपूतों की है. ब्राह्मण और कायस्थ उसके बाद ही आते हैं. भूमिहारों का अपना अलग भौगोलिक क्षेत्र है और वो अपना वोट मुसलमानों की ही तरह अपनी जाति या अपनी पसंद के नेता को एक मुश्त देते रहे हैं. राजपूत, कायस्थ और ब्राह्मणों में इतनी अधिक और सार्वकालिक एकता वोट के नाम पर नहीं रह पाती है.

हालांकि यहां राजपूत ऐसी स्थिति में हैं कि वो यादवों को चुनौती देते रहे हैं लेकिन कभी आपसी भीतरघात तो कभी उनके वोट देने के प्रति रुझान की कमी की वजह से यादव इस मामले में बाज़ी मार ले जाते हैं. इसके अलावा पिछड़ा और मुस्लिम समीकरण एक अलग मुद्दा है जिसपर अभी चर्चा नहीं की जा सकती. फिर भी मोटे तौर पर राजपूत जाति ही एक ऐसी जाति है जिसके नेताओं से अपेक्षा थी कि वो सत्ता-परिवर्तन के मामले में यादव या किसी अन्य पिछड़ी जाति के नेता के हाथों से बिहार की गद्दी छीनने का माद्दा रखते हैं लेकिन यहां राजपूत एकजुट होने की बजाय अपनी-अपनी गुटबाजी और नाक की लड़ाई में अधिक व्यस्त रहे हैं जिससे खुद उनके नेताओं में अब इस मुद्दे पर आत्म-विश्वास की कमी साफ़ दिखाई देती है. एक और कारण यह भी है कि ना तो राजपूत जाति और ना ही उसके नेता अन्य अगड़ी जातियों को अपनी तरफ खींच पाए. यही कारण है कि उनकी सर्व-स्वीकार्यता नहीं बन पाती है.

मुझे याद है एक दफ़ा करीब 3-4 साल पहले बीजेपी के युवा राजपूत नेता श्री राजीव प्रताप रूडी के आवास पर मैं और कुछ साथी पत्रकार विजयादशमी के अवसर पर साथ बैठकर भोजन कर रहे थे, तब इस विषय पर चर्चा के दौरान मैंने श्री रूडी से उनके बिहार के मुख्य-मंत्रित्व की सम्भावना पर सवाल किया था. इसके जवाब में उनके चेहरे पर निराशा के भाव थे और उनका कहना था कि बिहार में अभी लंबे समय तक कोई राजपूत मुख्यमंत्री नहीं बन सकता. जातिगत समीकरण अभी इतने प्रबल हैं कि सिवाय पिछडों के गद्दी पर बैठने के और कोई सम्भावना नहीं है.

और भी कई बातें हुईं जिनका अर्थ और कारण लगभग वही है जिसका उल्लेख मैंने ऊपर किया है.

बिहार में श्री नीतीश कुमार और श्री लालू प्रसाद यादव के बाद किसी प्रमुख दल के नेता के तौर पर पिछले कुछ वर्षों से श्री सुशील कुमार मोदी का नाम सबसे ऊपर है और क्यूं न हो पहले वो लालू की सरकार के दौरान विपक्ष के नेता रहे बल्कि यूँ कहिये कि एक ऐसे नेता रहे जिसने लालू की पार्टी की सरकार के पूरे शासनकाल के दौरान तमाम घोटालों और भ्रष्टाचार के बावजूद एक बार भी उसके खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव तक लाने की जहमत नहीं उठाई.

ये वही सुशील कुमार मोदी हैं जो सन 1973 में पटना विश्वविद्यालय छात्रसंघ के महा-सचिव थे, और उस दौरान उसी छात्र-संघ के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव हुआ करते थे. यानि यहां से दोनों का साथ शुरू हुआ था और इसके बाद दोनों जे.पी. के साथ जुड़े और उनके आंदोलन में भाग लेकर जेल गए. फिर नेता बने. तमाम विरोधों के बावजूद एक सम्बन्ध बना रहा जिसकी कीमत दोनों ने एक-दूसरे के लिये वक़्त-वक़्त पर अदा करने की कोशिश की.

सुशील मोदी खुद पिछड़ी जाति से आते हैं जिसकी गिनती ओबीसी कैटेगरी में होती है और दूसरी तरफ श्री गिरिराज सिंह हैं जो बिहार में राजपूत के बाद दूसरी बाहुबली कही जाने वाली भूमिहार-ब्राह्मण जाति से आते हैं.

कहीं न कहीं गिरिराज अपने अंदर उसी टीस के साथ राजनीति कर रहे हैं जिसकी वजह से बिहार की अगड़ी जाति के लोग पिछले 24 बरस से खुद को बेबस महसूस करते रहे हैं. ये बात सिर्फ टीस की ही नहीं बल्कि महत्वाकांक्षा और वर्चस्व की भी है और इसी बात का भावनात्मक फायदा उठाने की कोशिश में हैं गिरिराज.

एक कहावत है कि भूमिहार के पेट में इतने बल होते हैं कि अगर उसको कील खिलाई जाये तो अगले दिन तो पेंच बनकर बाहर निकलती है. यहां इस बात का मतलब यही है कि गिरिराज सिंह कोई बेवकूफ इंसान नहीं हैं, वो अपनी हर चाल सोच-समझकर चल रहे हैं. बिहार में अब उनका मुकाबला अपनी ही पार्टी के सुशील मोदी से है जो अब ‘सुमो’ कहलाना पसंद करते हैं. सनद रहे कि नरेंद्र मोदी के पीएम कैंडिडेट घोषित होने के पहले से लेकर अभी तक की चुनावी रैलियों और प्रचार तक इन दोनों ने अपने-अपने तरीके से जमकर मेहनत की है और ‘नमो’ के नाम का ढोल पूरे बिहार में बजाया है.

लेकिन एक तरफ जहां संगठन में अपनी पकड़ और अपने मनमाफिक और रबर-स्टैम्प सरीखे  प्रदेश पार्टी अध्यक्ष श्री मंगल पाण्डेय की बदौलत सुशील मोदी रह-रहकर बढ़त बनाते रहे हैं और बिहार में लोकसभा टिकट के बंटवारे को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी चलती चलाने की उन्होंने भर-पूर कोशिश की है, वहीं उनकी इस चाल का शिकार बने गिरिराज, नरेंद्र मोदी के पास शिकायत करके उनको अपने तर्कों और उनके प्रति अपने विवादस्पद और चरण-वंदना सरीखे बयानों से उनको प्रभावित कर उनके साथ अपना व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाने में सफल हो चुके हैं. इसी का नतीजा है कि नरेंद्र मोदी अब बिहार के इस नेता को नज़र-अंदाज़ नहीं करना चाहते और गाहे-बगाहे उनसे संपर्क बनाये रहते हैं क्यूंकि उनको पता है कि इतना शोर करने वाला ये इंसान उनका फायदा भले ही कम कराये पर नुकसान बहुत ज्यादा करा सकता है और यही वो विषय है जहां गिरिराज, सुशील मोदी को सबसे ज्यादा मात देते हैं.

गिरिराज की दहाड़ के सामने सुशील मोदी की आवाज़ सियार की तरह मालूम होती है और इसकी वजह से बिहार में बीजेपी के समर्थक और अगड़ी जाति के लोगों में धीरे-धीरे गिरिराज सचमुच के ‘गिरि-राज’ बनते जा रहे हैं. यहां के सवर्णों को लगने लगा है कि उनके पिछले 24 सालों के दर्द और कसक को इतने अरसे बाद कोई अपनी दहाड़ से आवाज़ दे रहा है पर दुर्भाग्य से वो जिसे दहाड़ समझ रहे हैं वो सिवाय अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्त्ति और खुद को स्थापित और सुरक्षित करने की फरियाद से ज्यादा कुछ नहीं है. हालत ये कि सूमो के जवाब में गिरिराज ने भी फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल माध्यमों पर अपना प्रचार और उद्घोष शुरू कर रखा है और इस तीर से भी वो दो निशाने साध रहे हैं. एक तरफ वो नमो के साथ-साथ पार्टी के प्रचार और समर्थन के बहाने अपना बड़-बोलापन दिखाकर लोगों की मानसिकता को अपनी तरफ मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं वहीं इन आधुनिक संवाद माध्यमों पर भी वो सुमो को पछाड़ने और युवा एवं पढ़ी-लिखी बिहारी पीढ़ी के करीब पहुंच गए हैं.

बड़ी सीधी सी बात है, चाहे सुमो हो या गिरिराज, दोनों का निशाना दूर तक है और इसी वजह से दोनों सबसे पहले नरेंद्र मोदी का डंका पीटते हुए उनको रिझाने और अपनी-अपनी स्वामिभक्ति दिखाने की होड़ में लगे हैं जिसका पहला पड़ाव मोदी के संभावित मंत्रिमंडल में मंत्री बनना और दूसरे सबसे बड़े निशाने के तौर पर नीतीश के बाद बिहार की गद्दी के दावेदार के तौर पर स्थापित होने की कोशिश के तौर पर है.

    इसलिए, गिरिराज सिंह हों या सुशील मोदी दोनों ही बिहार की राजनीति के शातिर खिलाड़ी हैं और उनके बयान मीडिया और जनता में जितना बवाल मचाएंगे, उनके लिये ये उतना ही फायदेमंद होगा. इस बड़-बोलेपन के खेल का असली मज़ा अब या तो 16 मई के बाद नज़र आएगा या फिर इंतज़ार करिये अगले साल 2015 के बिहार के विधानसभा चुनाव का.
बस जो अब तक धुंधला है वो कल तक पूरा साफ़ नज़र आने लगेगा.