बिहार की राजनीति में पिछले डेढ़-दो साल में कभी सत्ता
के साथी रहे बीजेपी-जद(यू) के गठजोड़ में क्रमशः क्षरण होता गया और इस क्षरण में
वैसे तो कई बड़े और छोटे नाम वाले नेताओं ने अपनी-अपनी भूमिका निभाई मगर सबसे
ज्यादा प्रमुख रूप से कुख्यात होने वालों में एक तरफ जद(यू) से श्री शिवानंद तिवारी तो दूसरी तरफ
बीजेपी से श्री गिरिराज सिंह रहे हैं.
चूंकि ये विषय श्री गिरिराज सिंह पर आधारित है
तो उनपर ही यह आलेख केंद्रित रहेगा.
जहां तक बिहार की राजनीति का प्रश्न है तो आज़ादी
के बाद बाबू श्री कृष्ण सिंह से लेकर 1990 की शुरुआत तक बिहार
की गद्दी पर प्रमुखतया अगड़े ही काबिज़ रहे जिनमें सभी सवर्ण जातियां शामिल हैं.
ब्राह्मण के रूप में श्री जगन्नाथ मिश्र आखिरी
अगड़े नेता थे जो श्री लालू प्रसाद यादव के पहले सत्ता सम्हाल रहे थे.
1990 में लालू को वी.पी. सिंह के साथ का फायदा
हुआ और आरक्षण और मंडल की आग ने बिहार की राजनीति को खुलकर और पूरी तरह से जातिगत
रण-भूमि में बदल दिया जिसका असर ये हुआ कि लालू इसे अपना जादू और अदृश्य जिन्न की
ताकत बताते हुए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में लगभग 15 बरस तक रहे. उनके
बाद भाजपा के कंधे पर सवार होकर श्री नीतीश कुमार आये जो ‘कुर्मी’ यानि पिछड़े हैं
और अभी तक अपने को विकास-पुरुष बताते हुए सत्ता पर काबिज़ हैं.
कुल हिसाब लगाया जाये तो पिछले 24 बरस से बिहार में
अगड़ी जाति से कोई भी नेता इस राज्य के मुख्य-मंत्री की कुर्सी के आस-पास भी फटक
नहीं पाया है. जाहिर है इसकी कसक बिहार की अगड़ी जाति और उसकी नुमाइंदगी करने वाले
नेताओं में है.
इस राज्य में अधिकांश जनसंख्या यादव, पिछडों और
राजपूतों की है. ब्राह्मण और कायस्थ उसके बाद ही आते हैं. भूमिहारों का अपना अलग
भौगोलिक क्षेत्र है और वो अपना वोट मुसलमानों की ही तरह अपनी जाति या अपनी पसंद के
नेता को एक मुश्त देते रहे हैं. राजपूत, कायस्थ और ब्राह्मणों में इतनी अधिक और
सार्वकालिक एकता वोट के नाम पर नहीं रह पाती है.
हालांकि यहां राजपूत ऐसी स्थिति में हैं कि वो
यादवों को चुनौती देते रहे हैं लेकिन कभी आपसी भीतरघात तो कभी उनके वोट देने के
प्रति रुझान की कमी की वजह से यादव इस मामले में बाज़ी मार ले जाते हैं. इसके अलावा
पिछड़ा और मुस्लिम समीकरण एक अलग मुद्दा है जिसपर अभी चर्चा नहीं की जा सकती. फिर
भी मोटे तौर पर राजपूत जाति ही एक ऐसी जाति है जिसके नेताओं से अपेक्षा थी कि वो
सत्ता-परिवर्तन के मामले में यादव या किसी अन्य पिछड़ी जाति के नेता के हाथों से
बिहार की गद्दी छीनने का माद्दा रखते हैं लेकिन यहां राजपूत एकजुट होने की बजाय
अपनी-अपनी गुटबाजी और नाक की लड़ाई में अधिक व्यस्त रहे हैं जिससे खुद उनके नेताओं
में अब इस मुद्दे पर आत्म-विश्वास की कमी साफ़ दिखाई देती है. एक और कारण यह भी है
कि ना तो राजपूत जाति और ना ही उसके नेता अन्य अगड़ी जातियों को अपनी तरफ खींच पाए.
यही कारण है कि उनकी सर्व-स्वीकार्यता नहीं बन पाती है.
मुझे याद है एक दफ़ा करीब 3-4 साल पहले बीजेपी के
युवा राजपूत नेता श्री राजीव प्रताप रूडी के आवास पर मैं और कुछ साथी पत्रकार विजयादशमी
के अवसर पर साथ बैठकर भोजन कर रहे थे, तब इस विषय पर चर्चा के दौरान मैंने श्री
रूडी से उनके बिहार के मुख्य-मंत्रित्व की सम्भावना पर सवाल किया था. इसके जवाब
में उनके चेहरे पर निराशा के भाव थे और उनका कहना था कि बिहार में अभी लंबे समय तक
कोई राजपूत मुख्यमंत्री नहीं बन सकता. जातिगत समीकरण अभी इतने प्रबल हैं कि सिवाय
पिछडों के गद्दी पर बैठने के और कोई सम्भावना नहीं है.
और भी कई बातें हुईं जिनका अर्थ और कारण लगभग वही
है जिसका उल्लेख मैंने ऊपर किया है.
बिहार में श्री नीतीश कुमार और श्री लालू प्रसाद
यादव के बाद किसी प्रमुख दल के नेता के तौर पर पिछले कुछ वर्षों से श्री सुशील
कुमार मोदी का नाम सबसे ऊपर है और क्यूं न हो पहले वो लालू की सरकार के दौरान
विपक्ष के नेता रहे बल्कि यूँ कहिये कि एक ऐसे नेता रहे जिसने लालू की पार्टी की
सरकार के पूरे शासनकाल के दौरान तमाम घोटालों और भ्रष्टाचार के बावजूद एक बार भी
उसके खिलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव तक लाने की जहमत नहीं उठाई.
ये वही सुशील कुमार मोदी हैं जो सन 1973 में पटना
विश्वविद्यालय छात्रसंघ के महा-सचिव थे, और उस दौरान उसी छात्र-संघ के अध्यक्ष
लालू प्रसाद यादव हुआ करते थे. यानि यहां से दोनों का साथ शुरू हुआ था और इसके बाद
दोनों जे.पी. के साथ जुड़े और उनके आंदोलन में भाग लेकर जेल गए. फिर नेता बने. तमाम
विरोधों के बावजूद एक सम्बन्ध बना रहा जिसकी कीमत दोनों ने एक-दूसरे के लिये
वक़्त-वक़्त पर अदा करने की कोशिश की.
सुशील मोदी खुद पिछड़ी जाति से आते हैं जिसकी
गिनती ओबीसी कैटेगरी में होती है और दूसरी तरफ श्री गिरिराज सिंह हैं जो बिहार में
राजपूत के बाद दूसरी बाहुबली कही जाने वाली भूमिहार-ब्राह्मण जाति से आते हैं.
कहीं न कहीं गिरिराज अपने अंदर उसी टीस के साथ राजनीति
कर रहे हैं जिसकी वजह से बिहार की अगड़ी जाति के लोग पिछले 24 बरस से खुद को बेबस
महसूस करते रहे हैं. ये बात सिर्फ टीस की ही नहीं बल्कि महत्वाकांक्षा और वर्चस्व
की भी है और इसी बात का भावनात्मक फायदा उठाने की कोशिश में हैं गिरिराज.
एक कहावत है कि भूमिहार के पेट में इतने बल होते
हैं कि अगर उसको कील खिलाई जाये तो अगले दिन तो पेंच बनकर बाहर निकलती है. यहां इस
बात का मतलब यही है कि गिरिराज सिंह कोई बेवकूफ इंसान नहीं हैं, वो अपनी हर चाल
सोच-समझकर चल रहे हैं. बिहार में अब उनका मुकाबला अपनी ही पार्टी के सुशील मोदी से
है जो अब ‘सुमो’ कहलाना पसंद करते हैं. सनद रहे कि नरेंद्र मोदी के पीएम
कैंडिडेट घोषित होने के पहले से लेकर अभी तक की चुनावी रैलियों और प्रचार तक इन
दोनों ने अपने-अपने तरीके से जमकर मेहनत की है और ‘नमो’ के नाम का ढोल पूरे
बिहार में बजाया है.
लेकिन एक तरफ जहां संगठन में अपनी पकड़ और अपने
मनमाफिक और रबर-स्टैम्प सरीखे प्रदेश पार्टी
अध्यक्ष श्री मंगल पाण्डेय की बदौलत सुशील मोदी रह-रहकर बढ़त बनाते रहे हैं और
बिहार में लोकसभा टिकट के बंटवारे को लेकर अप्रत्यक्ष रूप से अपनी चलती चलाने की उन्होंने
भर-पूर कोशिश की है, वहीं उनकी इस चाल का शिकार बने गिरिराज, नरेंद्र मोदी के पास
शिकायत करके उनको अपने तर्कों और उनके प्रति अपने विवादस्पद और चरण-वंदना सरीखे
बयानों से उनको प्रभावित कर उनके साथ अपना व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाने में सफल हो
चुके हैं. इसी का नतीजा है कि नरेंद्र मोदी अब बिहार के इस नेता को नज़र-अंदाज़ नहीं
करना चाहते और गाहे-बगाहे उनसे संपर्क बनाये रहते हैं क्यूंकि उनको पता है कि इतना
शोर करने वाला ये इंसान उनका फायदा भले ही कम कराये पर नुकसान बहुत ज्यादा करा
सकता है और यही वो विषय है जहां गिरिराज, सुशील मोदी को सबसे ज्यादा मात देते हैं.
गिरिराज की दहाड़ के सामने सुशील मोदी की आवाज़
सियार की तरह मालूम होती है और इसकी वजह से बिहार में बीजेपी के समर्थक और अगड़ी
जाति के लोगों में धीरे-धीरे गिरिराज सचमुच के ‘गिरि-राज’ बनते जा रहे हैं.
यहां के सवर्णों को लगने लगा है कि उनके पिछले 24 सालों के दर्द और कसक को इतने अरसे बाद
कोई अपनी दहाड़ से आवाज़ दे रहा है पर दुर्भाग्य से वो जिसे दहाड़ समझ रहे हैं वो
सिवाय अपनी महत्वाकांक्षा की पूर्त्ति और खुद को स्थापित और सुरक्षित करने की
फरियाद से ज्यादा कुछ नहीं है. हालत ये कि सूमो के जवाब में गिरिराज ने भी फेसबुक
और ट्विटर जैसे सोशल माध्यमों पर अपना प्रचार और उद्घोष शुरू कर रखा है और
इस तीर से भी वो दो निशाने साध रहे हैं. एक तरफ वो नमो के साथ-साथ पार्टी के
प्रचार और समर्थन के बहाने अपना बड़-बोलापन दिखाकर लोगों की मानसिकता को अपनी तरफ
मोड़ने की कोशिश कर रहे हैं वहीं इन आधुनिक संवाद माध्यमों पर भी वो सुमो को पछाड़ने
और युवा एवं पढ़ी-लिखी बिहारी पीढ़ी के करीब पहुंच गए हैं.
बड़ी सीधी सी बात है, चाहे सुमो हो या गिरिराज,
दोनों का निशाना दूर तक है और इसी वजह से दोनों सबसे पहले नरेंद्र मोदी का डंका
पीटते हुए उनको रिझाने और अपनी-अपनी स्वामिभक्ति दिखाने की होड़ में लगे हैं जिसका
पहला पड़ाव मोदी के संभावित मंत्रिमंडल में मंत्री बनना और दूसरे सबसे बड़े निशाने
के तौर पर नीतीश के बाद बिहार की गद्दी के दावेदार के तौर पर स्थापित होने की
कोशिश के तौर पर है.
इसलिए, गिरिराज सिंह हों या सुशील मोदी दोनों ही
बिहार की राजनीति के शातिर खिलाड़ी हैं और उनके बयान मीडिया और जनता में जितना बवाल
मचाएंगे, उनके लिये ये उतना ही फायदेमंद होगा. इस बड़-बोलेपन के खेल का असली मज़ा अब
या तो 16 मई के बाद नज़र आएगा या फिर इंतज़ार करिये अगले साल 2015 के बिहार के
विधानसभा चुनाव का.
बस जो अब तक धुंधला है वो कल तक पूरा साफ़ नज़र आने
लगेगा.
