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लोकवाणी
Friday, August 8, 2014
खतरनाक 'इबोला' से बचाव के लिए इन दवाओं से है उम्मीद
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ब्रिटिश हुकूमत की पैदाइश 'राज्यपाल' के पद की इस देश को जरूरत क्यों है !
मिजोरम की राज्यपाल कमला बेनीवाल के रिटायरमेंट में महज दो महीने बचे थे. लेकिन सरकार ने उसके पहले ही उन्हें राजभवन से चलता कर दिया है.
राज्यपाल को लेकर इस देश में विवाद होना कोई नई बात नहीं है. साल 1967 के बात राज्यपाल के पद और उसके उपयोगों और दुरुपयोगों को लेकर विवाद होते ही रहे हैं. ऐसे में ये सवाल अहम हो जाता है कि अंग्रेजों के द्वारा बनाये गए पद की आज के दौर में क्या अहमियत बची है और जब इस पद की गरिमा ही नहीं बच पा रही है तो इसे समाप्त क्यों न कर दिया जाये !
भारत में राज्यपाल के पद के सृजन का इतिहास
भारत में राज्यपाल के पद की अवधारणा ब्रिटिश राज के समय अस्तित्व में आई थी. उन्नीसवीं सदी के अंत तक ब्रिटिश -भारत में देश आठ प्रांतों में बंटा हुआ था, जिसका प्रशासन राज्यपाल या उप-राज्यपाल करते थे. उसके बाद सन 1905-1911 में बंगाल विभाजन के दौरान असम और पूर्वी बंगाल जैसे दो और राज्यों का जन्म हुआ, जो उप-राज्यपाल द्वारा शासित किये जाते थे. 1947 में देश की आजादी के बाद भी हमारे नीति-निर्माताओं के द्वारा इस पद को बनाये रखा गया. 1950 से 1967 तक देश के राज्यों में कांग्रेसी सरकारें ही सत्ता में थी. नतीजतन राज्यपाल की नियुक्ति से पहले सम्बन्धित राज्य के मुख्यमंत्री से विचार-विमर्श किये जाने की औपचारिक प्रथा का निर्वाह किया जाता था लेकिन सन 1967 के चुनावों में जब कुछ राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारों का गठन हुआ, तब इस प्रथा को समाप्त कर दिया गया और मुख्यमंत्री से विचार विमर्श किए बिना राज्यपाल की नियुक्ति की जाने लगी. बस, इसी समय से राज्यपाल के गरिमामय पद की महत्ता अपना अर्थ खोने लगी.
राज्यपाल का पद और उससे जुड़े कुछ प्रमुख विवाद :
राज्यपालों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है. 1967 के बाद से लगभग हर दौर में ऐसे विवाद कायम रहे हैं और सत्ता में बैठी सरकारें और विपक्ष एक-दूसरे पर इस पद के दुरुपयोग को लेकर आरोप-प्रत्यारोप लगते रहे हैं. देश की कई प्रमुख सरकारों और उनके द्वारा बनाये गए राज्यपालों के दौर में हुए विवाद और उन राज्यपालों के ऊपर लगे आरोपों के अलावा केंद्र में बैठी तात्कालिक सरकारों के द्वारा इस पद के दुरुपयोग को आरोपित करते कई प्रमुख तथ्य इस बात को दिखाते हैं कि किस तरह से बीते कुछ दशकों में इस पद उपयोग अपने-अपने लाभ के लिए सरकारें और उस पद पर आसीन रहे लोग करते रहे हैं. विशेषरूप से आपातकाल की समाप्ति और जनता पार्टी की सरकार के बाद दुबारा सत्ता में आईं इंदिरा गांधी के दौर में जब राज्यों में गैर कांग्रेसी सरकारें बनीं तो उन्होंने ऐसे राज्यपाल नियुक्त करने की परम्परा शुरू की जो कि सक्रिय पार्टी कार्यकर्ता की तरह से काम करने वाले हों. यानि वो राज्यपाल के निष्पक्ष और संवैधानिक पद पर रहते हुए भी सत्ताधारी सरकार के विश्वासपात्र बने रहें. बाद में कांग्रेस द्वारा शुरू किये गए इसी तर्ज पर दूसरे दल भी चलने लगे.
ऐसे ही कुछ विवादों पर एक नज़र डालते हैं ताकि ये निर्णय किया जा सके कि इस देश में राज्यपाल का पद अब कितना उपयोगी रह गया है -
हरियाणा :
राज्यपालों के पक्षपातपूर्ण रवैये को दर्शाती घटनाओं में से एक घटना हरियाणा की है. ये उस दौर की शुरुआत थी जिसमें केंद्र की सरकार राज्यपालों को अपने फायदे और विरोधियों के नुकसान के लिए इस्तेमाल करने लगी थी. इसी कड़ी में, हरियाणा में देवीलाल के साथ भी राज्यपाल ने सत्ता के आदेश पर अन्याय किया. उस समय हरियाणा के तत्कालीन राज्यपाल गणपतराव देवजी तपासे ने देवीलाल के पास ज्यादा विधायक होने के बावजूद उन्हें सरकार बनाने का मौका नहीं दिया और एक तरफ़ा निर्णय लेते हुए राज्य में देवीलाल की जगह भजनलाल की सरकार बनवा दी थी. इस पक्षपातपूर्ण घटना पर उस वक़्त देवीलाल राज्यपाल गणपतराव से इतने नाराज हो गए थे कि उन्होंने गुस्से में आकर तपासे की गर्दन ही पकड़ ली थी. ताऊ का ये गुस्सा सिर्फ मानवीय संवेदना की उपज नहीं था बल्कि लोकतान्त्रिक अधिकारों के हनन के विरोध का भी द्योतक था.
आंध्र-प्रदेश :
उसी दौर में इन नामों में आंध्र-प्रदेश के राज्यपाल रामलाल भी बहुत चर्चित रहे थे. दरअसल, आन्ध्र-प्रदेश से इंदिरा गांधी का विशेष लगाव था क्योंकि जनता पार्टी के सत्ता में आने के बाद वे आन्ध्र में ही मेडक से लोकसभा का चुनाव जीती थीं. उस वक़्त राज्य में कांग्रेस का सफाया हो चुका था और एन.टी. रामाराव सत्ता में आ चुके थे. इंदिरा गांधी के लिए एन.टी.आर. का आंध्र की सत्ता में आना एक खतरनाक संकेत था क्योंकि उस ज़माने में रामाराव की लोकप्रियता और महत्वाकांक्षा इतनी बढ़ चुकी थी कि वो खुद के प्रधानमंत्री बनने के सपने तक देखने लगे थे. एन. टी. रामाराव के इस डर से निपटने के लिए इंदिरा गांधी ने हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री रामलाल को 1984 में आंध्र-प्रदेश का राज्यपाल बना कर भेजा. नतीजतन आंध्र-प्रदेश में कांग्रेस ने राजनीतिक तोड़-फोड़ शुरु कर दी. जरूरी बहुमत होने के बावजूद रामाराव की सरकार बर्खास्त कर दी गई और आंध्र-प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.
कर्नाटक :
1. ऐसा ही कुछ काम कर्नाटक में राज्यपाल बने पी. वैंकटसुबैय्या ने भी किया. उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई को विधानसभा में बहुमत साबित करने का मौका ही नहीं दिया. विरोधस्वरूप उनके इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. उच्चतम न्यायालय ने वैंकटसुबैय्या इस कदम को गलत ठहराते हुए न सिर्फ उसकी निंदा की थी बल्कि ये भी कहा कि बहुमत परीक्षण सदन में ही किया जाना चाहिए. कोर्ट का यह फैसला ऐतिहासिक था और इस नजीर का आज तक पालन किया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट का यह महत्वपूर्ण फैसला आने के बाद राज्यपाल पी. वैंकट सुबैय्या को शर्मिंदगी की वजह से अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था.
2. धुर कांग्रेसी नेता और कर्नाटक के राज्यपाल रहे हंसराज भारद्वाज भी लगातर विवादों में घिरे रहे हैं. जनता पार्टी के शासन के दौरान यही हंसराज भारद्वाज श्रीमती इंदिरा गांधी व संजय गांधी के वकील हुआ करते थे. तत्कालीन शाह आयोग के सामने इन्होंने ही दोनों की पैरवी की थी. केंद्र में कानून-मंत्री रहते हुए उनके ही कार्यकाल में कोर्ट द्वारा बोफोर्स कांड के मुख्य आरोपी क्वात्रोची के सील किए गए बैंक खातों को मुक्त किया गया था जिसकी वजह से क्वात्रोची अपने उन खातों से पैसा निकाल पाया था. भारद्वाज ने राज्यपाल के रूप में विवादास्पद रूप से कर्नाटक की विधानसभा भंग करके केंद्र सरकार को वहां राष्ट्रपति शासन लगाए जाने की सिफारिश करते अपनी रिपोर्ट भेजी थी मगर विपक्ष के दबाव और विरोध के कारण ऐसा हो नहीं.
उत्तर-प्रदेश :
1. वफ़ादारी निभाने की कड़ी में ही इंटेलीजेंस ब्यूरो यानि आईबी के पूर्व निदेशक रहे टी.वी. राजेश्वर को भी सत्तारुढ़ दल कांग्रेस के साथ निष्ठा अदा करने का लाभ मिला. उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया था. उस ज़माने में ये खबर आम थी कि जब इंदिरा गांधी के फार्म हाउस पर सी.बी.आई. का छापा पड़ा था तो उन्हें राजेश्वर की ही बदौलत उसकी पूर्व सूचना मिली थी. संकट के उस वक्त पर की गई उनकी इस सेवा को इंदिरा के परिवार ने कभी नहीं भुलाया. फलस्वरूप न सिर्फ उन्हें आईबी का प्रमुख बनाया बल्कि बाद में उत्तर प्रदेश का राज्यपाल भी बनाकर उनकी सेवा का पुरस्कार दिया गया था.
2. रोमेश भंडारी ने भी उत्तर-प्रदेश का राज्यपाल रहते हुए अपने कार्यकाल में विवादों को जन्म दिया. उन्होंने कल्याण सिंह को विधानसभा में अपना बहुमत साबित करने का मौका न देकर उनकी जगह जगदंबिका पाल को मुख्यमंत्री बना दिया. उस समय लोकतांत्रिक कांग्रेस के नेता के तौर पर जगदम्बिका पाल का नाम महज 24 घंटे के मुख्यमंत्री के तौर पर दर्ज हो गया क्योंकि राज्यपाल भंडारी के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दी गई चुनौती पर कोर्ट ने कर्नाटक मामले की तर्ज पर कहा था कि राजभवन जैसी जगह राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाई जानी चाहिए और सरकार बनने के बाद उसके बहुमत की परीक्षा सदन में ही की जानी चाहिए.
बिहार :
बिहार का राज्यपाल बनने पर बूटा सिंह ने तो एक कदम आगे जाकर नीतीश कुमार की अगुआई में उनके सरकार बनाने के दावे को न सिर्फ खारिज कर किया बल्कि इसके साथ ही विधानसभा भंग करने तक की सिफारिश कर दी. उनके इस कदम की जमकर आलोचना हुई और उनके निर्णय को भी सुप्रीम कोर्ट ने गलत ठहरा दिया. चौतरफा आलोचना और किरकिरी के बाद किसी तरह बूटा सिंह ने इस्तीफा दिया था. बूटा सिंह के कार्यकाल के दौरान राजभवन पर राज्य में अफसरों की पोस्टिंग, स्थानांतरण के अलावे शिक्षकों की नियुक्ति से लेकर तमाम सरकारी कामों में उनकी तरफ से उनके बेटे के द्वारा अवैध धन-कमाने के कई संगीन आरोप भी लगते रहे थे.
इन उदाहरणों से ये साफ़ नज़र आता है कि आज के दौर में राज्यपाल का पद अपने संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप कार्य करने की जगह सत्ताधारी दलों के नफे-नुकसान के लिए इस्तेमाल हो रहा है. ऐसे में देश में इस पद की उपयोगिता पर सार्थक वाद की जरूरत है. राज्यों की राजधानियों की सैकड़ों एकड़ की भूमि पाकर बने राजभवनों से ज्यादा हमें अच्छे अस्पतालों, शिक्षण संस्थानों की जरूरत है. जनता की मेहनत के जिन करोड़ों रुपयों का अपनी सुविधा और हवाई घुमक्कड़ी में बेजां इस्तेमाल का आरोप इन लोगों पर लग रहा है क्या उसके लिए बोलने का इस देश की जनता को हक नहीं है !
अंग्रेज़ इस देश को तो सन 1947 में ही छोड़कर चले गए थे फिर आज तक हम उनके द्वारा, उनके फायदे और उनकी जरूरत के हिसाब से बनाये गए ऐसे किसी पद को क्यों ढो रहे हैं ? वैसे भी, राज्यपाल केवल राष्ट्रपति का प्रतिनिधि होता है और राज्यपाल की शक्तियां राष्ट्रपति में ही समाहित रहती हैं. ऐसे में, विकल्प के रूप में संविधान के शीर्ष रक्षक के तौर पर या तो केवल राष्ट्रपति को ही सभी राज्यों का पालक माना जा सकता है या फिर देश में मौजूद दर्जनों राज्यपालों की जगह पर पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण के राज्यों को रेखांकित कर राष्ट्रपति के प्रतिनिधि के रूप में महज 4 राज्यपालों के पद का सृजन करके भी देश में राज्यपाल की जरूरतों को पूरा किया जा सकता है. ये मुद्दा विवेचना का है और ऐसा लगता है कि आज नहीं तो कल देश को अब इस पर सोचना होगा वरना इसी तरह से विवाद होते रहेंगे और सत्ताएं इस पद का दुरुपयोग कर इसका मजाक बनाती रहेंगी.
*** ( यह लेख आज दिनांक 08.08.2014 को प्रभात-खबर, रांची में प्रकाशित हो चुका है ).
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http://www.prabhatkhabar.com/news/137841-Governor-Kamla-Beniwal,-dismissal,-organically,-Prime-Minister-Narendra-Modi.html
Monday, April 21, 2014
बिहार के गिरिराज का ‘नमो’ और ‘सुमो’ कनेक्शन
Friday, February 15, 2013
मोदी नहीं बल्कि आडवाणी दे सकते हैं देश को बेहतर नेत्तृत्व.
नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार आज भले ही अपनी-अपनी पार्टियों के कद से ज्यादा बड़े हो चुके हों मगर लगातार सत्ता का उपभोग करने के कारण अब इनका व्यक्तित्व बहुत ही तानाशाही बन चुका है. दोनों अपने विरोधियों को मटियामेट करके ही दम लेते हैं और अपनी आलोचना इन्हें कतई पसंद नहीं. ऐसे में एनडीए को एक बार फिर से आडवाणी जैसे अनुभवी और अधिक स्वीकार्य नेता के बारे में सोचना चाहिए. देश के लिए भी उनका अनुभव और बदला हुआ मिजाज़ ज्यादा उपयोगी और सार्थक साबित हो सकता है क्योंकि विविध संस्कृतियों और धर्मों वाले इस देश के लिए कट्टर या तानाशाही प्रवृत्ति का नेत्तृव घातक हो सकता है. गुजरात और बिहार में विकास की आड़ में सत्ता की कुर्सी पर बैठकर अपने राजनीतिक विरोधियों और प्रतियोगियों को चुन-चुनकर ठिकाने लगाने की कला में ये दोनों ही कितने माहिर हैं इसका अंदाज़ इनके धुर विरोधियों और समर्थकों दोनों को है.
मेरी ये सोच लंबे अरसे से रही है और अभी दो दिन पहले ही भाजपा के थिंक-टैंक रहे गोविन्दाचार्य ने भी ऐसा ही बयान देकर सियासतदानों में खलबली मचा दी है. सबसे बड़ी मुश्किल तो ये है कि खुद को सबसे अनुशासित और अलग पार्टी कहने वाली पार्टी यानि भाजपा खुद अपनी गुटबाजी से अभी तक उबर नहीं पाई है. गुटबाज़ी की शुरुआत में अटल-आडवाणी की पीएम पद को लेकर आपसी होड़ चर्चा में आई थी मगर अटल जी का ज़माना गुजरने के बाद पार्टी में अनुशासन का स्तर क्रमशः और गिरना शुरू हुआ और उनके बाद शीर्ष क्रम में पहले आडवाणी आये लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी अस्वीकार्यता के बाद पार्टी की दूसरी और तीसरी कतार के नेताओं ने भी अपना-अपना ग्रुप बनाकर खुद के लिए गोलबंदी शुरू कर दी.
वैसे देखा जाये तो भाजपा के पुराने नेताओं के चुक जाने के बाद सबसे पहली दावेदारी सुषमा स्वराज की ही बनती है मगर उनके प्रबल प्रतियोगी के रूप में खुर्राट वकील और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बने अरुण जेटली ने भी पीएम पद के लिए अपनी दावेदारी 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही शुरू कर दी थी. इंटरनेट पर खुद को 2014 के रूप में अपने समर्थकों के माध्यम से प्रोजेक्ट करके जेटली ने इशारों-इशारों में सुषमा और पार्टी को ये सन्देश दे दिया था कि उन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता. इन सब के बीच मुरली मनोहर जोशी की योग्यता और वरीयता कहाँ गुम हो गई ये किसी को पता भी नहीं चल पाया और पार्टी के इन तथाकथित युवा नेताओं ने उन्हें अपनी-अपनी प्रतिद्वंदिता में ख़ामोशी से किनारे कर दिया.
मामला अगर सिर्फ सुषमा और जेटली के बीच ही रहता तो भी कोई बात नहीं थी मगर गडकरी के बीजेपी अध्यक्ष बनने का वक़्त आते-आते राजनाथ सिंह का खेमा भी अपनी ताल ठोकनी शुरू कर चुका था. रही सही कसर गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद पूरी हो गई जब पार्टी की तीसरी कतार के नेता मुख़्तार अब्बास नकवी, राजीव प्रताप रूडी और रविशंकर प्रसाद तक की लॉबी ऑफ द रिकॉर्ड दबी जुबान से अपने-अपने गुट के नेताओं का अंतिम लक्ष्य प्रधानमंत्री बनना बताने लगी.
हालाँकि, ये बात भी दीगर है कि आज अगर बीजेपी के थिंक-टैंक और तेज-तर्रार नेता प्रमोद महाजन जीवित रहते तो निश्चित रूप से समीकरण कुछ और होता लेकिन वर्तमान में सच यही है कि पिछले 1-2 साल में पार्टी और युवाओं में नरेन्द्र मोदी जिस कदर सबसे पसंदीदा उम्मीदवार के तौर पर उभरे हैं उससे बीजेपी के हर स्तर के नेताओं और उनके समर्थकों के माथे पर शिकन काफी बढ़ गयी है और ये स्वाभाविक भी है. बरसों से सत्ता के शिखर पर बैठने की हसरत को जब कोई इतनी बड़ी चुनौती देगा तो दिल में टीस उठना स्वाभाविक है. वैसे भी गुजरात चुनाव के बाद खासतौर पर मीडिया ने जिस तरह से मोदी को जनता की सबसे ज्यादा पसंद का नेता घोषित किया है तबसे पार्टी के नेताओं की बेचैनी हाई-ब्लडप्रेशर की तरह बढ़ गई है.
एक तरफ मोदी का नाम आने से एनडीए में नीतीश के मोदी विरोधी रुख की वजह से जेडी (यू) बीजेपी को आँखें दिखा रही है वहीँ पार्टी को भी डर है कि अगर मोदी को पीएम के उम्मीदवार के तौर पर घोषित कर दिया गया तो न सिर्फ एनडीए में दरार आ सकती है बल्कि पार्टी खुद अगले चुनावों में भीतरघात का सामना कर सकती है क्योंकि पार्टी के अंदर मौजूद मोदी विरोधी ताकतें कभी मोदी को चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनते नहीं देखना पसंद नहीं करेंगी. यही वजह है कि तमाम तैयारियों के बावजूद कुम्भ में मोदी का नाम घोषित न किया जाना ही पार्टी ने उचित समझा.
दूसरी तरफ आज तक मन में प्रधानमंत्री न बन पाने का मलाल पाले बैठे आडवाणी हैं जो कम से कम अभी तक तो खुद को अंदरूनी तौर से चुका हुआ नहीं मान पा रहे. अपनी पिछली पाकिस्तान यात्रा में जिन्ना की मज़ार पर फूल चढ़कर और जिन्ना को असाम्प्रदायिक बताकर खुद की सेकुलर छवि पेश करने की आडवाणी की कोशिश यही दिखाने की थी कि जो मुस्लिम समाज उन्हें राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे को लेकर हार्डकोर हिंदुत्त्वावादी मानता आया है वो उनकी इस सेकुलर बनने की कोशिश में उनके नजदीक आये ताकि भविष्य में उनकी इस छवि बदलने की कोशिश से उन्हें फायदा मिल सके. ध्यान देने वाली बात ये है कि जिन्ना प्रकरण की वजह से आडवाणी को बीजेपी और संघ दोनों तरफ से कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी मगर उनकी ये कोशिश भविष्य में उनके बहुत काम आ सकती है. गौरतलब है कि उक्त प्रकरण के बाद आडवाणी ने कोई मुस्लिम विरोधी बयान देने से गुरेज़ किया है और अन्य विवादित मुद्दों से भी खुद को दूर रखने की भरसक कोशिश की है जो आज तक कायम है. ये अपनी नयी छवि गढ़ने का ही तो तरीका है.
ऐसे में, राजनीति के इस खेल में कल को अगर नरेन्द्र मोदी के नाम पर एनडीए में फूट पड़ती है या चुनाव में पार्टी और गठबंधन को बहुमत के मुताबिक सीटें नहीं मिल पाती हैं और मोदी के नाम पर कोई दूसरा दल साथ देने को आगे नहीं आता है बीजेपी को अलग ही दांव चलना पड़ सकता है. ऐसे में पार्टी मोदी की कट्टर छवि को हटाकर उनकी जगह आडवाणी को उनके जिन्ना प्रकरण की बदौलत ज्यादा उदार छवि का और एक अनुभवी एवं योग्य उम्मीदवार के तौर पर पेशकर दूसरी पार्टियों की मदद लेकर सत्ता की चौखट को लांघने की कोशिश कर सकती है. वैसे भी जब कोई लकीर बड़ी दिख रही हो तो उसे छोटा करने के लिए उसके बगल में दूसरी ज्यादा बड़ी लकीर खींच दी जाये तो पहले वाली लकीर खुद ब खुद छोटी हो जाती है. कुछ यही हाल मोदी और आडवाणी के मुद्दे को लेकर भी नज़र आता है.
मोदी आज की तारीख में कांग्रेस और दूसरे दलों की कृपा से इतने बड़े कट्टर और सांप्रदायिक छवि के नेता के रूप में घोषित किये जा चुके हैं कि बड़ी आसानी से उनकी जगह आडवाणी या किसी भी अन्य नेता को बीजेपी ज्यादा सेकुलर और उदारवादी चेहरे के रूप में पेश कर सकती है.
वैसे भी आज देश जिस तरह के कट्टरता और विरोध के माहौल की ओर जा रहा है उसमें मोदी या नीतीश जैसे नेता देश के लिए और ज्यादा नुकसानदेह हो सकते हैं, ऐसे में अपनी उम्र, अनुभव और नयी छवि की वजह से आडवाणी अगर अचानक से दावेदारों की दौड़ में नज़र आने लगें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए...
Monday, July 11, 2011
विश्व का अकेला संस्कृत अखबार 'सुधर्मा' खतरे में

मैसूर से प्रकाशित होने वाले इस समाचार पत्र के सम्पादक के.वी.सम्पत कुमार का कहना है कि ' कोई भी प्रादेशिक या केन्द्रीय निकाय हमारी मदद के लिए आगे नहीं आया और निजी क्षेत्र के विभिन्न संगठनों का हाल भी अलग नहीं है. ' फिलहाल इस समाचार पत्र के 2,000 ग्राहक हैं.
जयालक्ष्मी हिंदी, तमिल, कन्नड़, अंग्रेजी व संस्कृत भाषाओँ की अच्छी जानकार हैं.जब उनसे पूछा गया कि वह बिना किसी मदद के एक 'मृत-भाषा' में समाचार पत्र क्यों निकाल रहे हैं तो इस पर कुमार की पत्नी जयालक्ष्मी ने कहा,
' कौन कहता है संस्कृत मर गई है ? हर सुबह लोग श्लोकों का उच्चारण करते हैं, पूजा करते हैं, विवाह, बच्चे के जन्म और मृत्यु सहित सारे संस्कार संस्कृत में सम्पन्न होते हैं. संस्कृत की वजह से ही भारत एकजुट है. यह हमारी मातृभाषा है जो अपने में कई भाषाओं को समेटे है. इसका विकास हो रहा है और अब तो आईटी व्यवसायी भी कहते हैं कि यह भाषा उपयोगी है. '
कुमार कहते हैं कि उनके पिता पंडित वरदराज आयंगर ने 15 जुलाई, 1970 को इस समाचार पत्र का प्रकाशन शुरू किया था. इतना ही नहीं श्री आयंगर ने ही 1990 में भारत के तत्कालीन सूचना एवं प्रसारण मंत्री श्री आई. के. गुजराल को संस्कृत की महत्ता समझाकर आकाशवाणी पर संस्कृत के समाचार पाठन की शुरुआत करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी. के. वी. सम्पत कुमार ने बताया, ' जब 1990 में श्री आयंगर की मृत्यु हुई तो उससे पहले उन्होंने कुमार से वादा लिया था कि वो किसी भी तरह से सुधर्मा को जारी रखेंगे. अब यह दैनिक एक मिशन की तरह उसी जुनून और समर्पण के साथ जारी है. आर्थिक तंगी के बावजूद कुमार कहते हैं कि - मैं अपने आखिरी वक्त तक इसका प्रकाशन करता रहूंगा. '
एक रुपये मूल्य में मिलने वाले इस समाचार पत्र में ज्यादातर लेख वेदों, योग, धर्म पर केंद्रित होते हैं. इसके साथ राजनीति, संस्कृति व अन्य विषयों पर भी लेख होते हैं. कुमार और उनकी पत्नी ही इस समाचार-पत्र के वितरकों व प्रकाशकों की भूमिका निभा रहे हैं. आज के दौर में जहाँ कोई भी अखबार 3.50 - 4.0 रुपये से कम का नहीं है, वहीँ आप सुधर्मा को मात्र 300 रुपयों में ही पूरे साल घर बैठे मंगवा सकते है. इसके साथ ही इसका इंटरनेट संस्करण ( http://sudharma.epapertoday.com/ ) भी शुरू हो चुका है. संस्कृत को विश्व की सबसे प्राचीन एवं अधिकतम भाषाओँ की जननी माना जाता है ऐसा 'मैक्समूलर' जैसे प्रकाण्ड पश्चिमी विद्वान भी मानते थे.
मैं समझता हूँ कि संकट की इस घड़ी में यदि हम भारतवासी अपनी इस सबसे प्राचीन देव एवं मातृभाषा की मदद को आगे नहीं आयेंगे तो इससे बड़ी लज्जाजनक बात और कोई नहीं हो सकती. आशा है हम इस गरिमामय संस्कृत-पत्र को मरने नहीं देंगे और आगे आकर इसकी मदद को हाथ बढ़ाएंगे.
Sudharma link :- http://sudharma.epapertoday.com/
wike link : - http://en.wikipedia.org/wiki/Sudharma
Sunday, December 26, 2010
बिहार चुनाव: महाविजय के महानायक नीतीश
जी हां, बिहार विधानसभा की कुल 243 सीटों में से दो तिहाई से भी ज्यादा बहुमत लाकर नीतीश कुमार ने ये साबित कर दिया है कि उनकी चलाई विकास की गाड़ी बिहार की पटरी पर न सिर्फ सरपट दौड़ने वाली है बल्कि उसने तो सभी विरोधी दलों को भी ऐतिहासिक रूप से धूल चटा दी है.
1995 के बाद किसी भी दल या गठबंधन को 150 से ज्यादा सीट नहीं मिली है. यहाँ तक कि 2005 के विधानसभा चुनाव में खुद एनडीए गठबंधन को भी कुल 143 सीटों पर ही सफलता मिली थी...लेकिन इस बार के चुनाव नतीजे ने पहले के सारे रिकॉर्ड को ध्वस्त करके रख दिया....
नीतीश के नेतृत्व में जेडीयू-बीजेपी गठबंधन ने उम्मीद से कहीं ज्यादा सीटें हासिल की हैं लेकिन एनडीए की इस जीत के असली सूत्रधार हैं नीतीश कुमार। आइये, महाविजय के इस महानायक की राजनीतिक पृष्ठभूमि पर भी एक नज़र डालते हैं.
वक्त ने करवट बदली,पुराने दोस्त पहले मतभेदी फिर विरोधी बन बैठे और आखिरकार नीतीश लालू और रामविलास सरीखे अपने पुराने साथियों से अलग हो गए और जार्ज और शरद यादव के साथ मिलकर थाम लिया एनडीए का दामन.
सेकुलर और ईमानदार छवि के मानेजाने वाले नीतीश को अपनी इस नई राह पर कम आलोचनाओं का सामना नहीं करना पड़ा लेकिन नीतीश ने किसी पक्के राजनेता की तरह कांटो के बीच से भी अपनी राह निकाल कर सबकी बोलती बंद कर दी.इस चुनाव के पहले भी जब चुनाव प्रचार को लेकर नरेन्द्र मोदी और वरुण गाँधी जैसे धुर हिन्दुवादी नेताओं के बिहार दौरे पर आने की बात बीजेपी के नेताओं ने की तो नीतीश ने अपनी सेकुलर छवि का ध्यान रखते हुए इन दोनों में से किसी भी नेता का बिहार दौरा रुकवा दिया.नीतीश के इस कदम पर गठबंधन बिखराव की कगार पर आ गया था मगर फिर भी ये नीतीश की सोशल इंजीनियरिंग, आत्म-विश्वास और विकास का ही कमाल था जिसकी बदौलत जनता ने नीतीश को सर-आँखों पर बिठाया और नीतीश ने अपने इस दांव से एक बार में ही न सिर्फ अपनी पार्टी और गठबंधन में अपने आलोचकों की बोलती बंद कर दी बल्कि खुद का स्तर मोदी और वरुण गाँधी से कहीं ऊँचा कर दिखाया.
नीतीश की इस जीत के कई मायने निकलते हैं और ऐसा मानने में कोई बुराई नहीं है की नीतीश अब प्रधानमंत्री पद के दावेदार बन सकने लायक नेताओं में शुमार हो गए हैं.विकास की जिस नाव पर सवार होकर देश के पश्चिमी राज्य गुजरात के मुख्यमंत्री मोदी बीजेपी की अगली कतार के प्रधानमंत्री पद के दावेदारों में से एक हैं तो वहीँ देश के पूर्वी राज्य बिहार से मोदी को इंकार का हाथ दिखने वाले नीतीश भी विकास के ही रथ पर सवार हो कर एनडीए के एक अलग दावेदार बनकर सामने आये हैं.जीत की खुशी में भी गुमान न दिखाते हुए नीतीश भले ही आज प्रधानमंत्री पद की किसी महत्वाकांक्षा से इंकार कर रहे हों मगर दिल ही दिल में हाँ की सम्भावना से इंकार नहीं कर सकते.
Friday, May 7, 2010
हिंदी भाषा एवं साहित्य की वर्त्तमान स्थिति.
देश की स्वतंत्रता के ६३ वर्षों के बाद भी हिंदी को आज तक राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा तो ना ही मिल सका अपितु इसकी भाषागत परिपाटी एवं शुद्धता का ह्रास उत्तरोत्तर होता ही जा रहा है.यह न केवल इस देश का दुर्भाग्य है वरन देशवासियों के लिए भी लज्जा का विषय होना चाहिए.आज हमारे बच्चे न केवल हिंदी की गिनतियाँ,पहाड़े भूलते जा रहे हैं बल्कि अब तो उनके लिए नारियल, हाथी,सप्ताह,महीने आदि के साथ-साथ सामान्य हिंदी के शब्द एवं संज्ञा आदि का स्थान भी अंगरेजी के Coconut, Elephant, Sunday,Monday...,January, February जैसे शब्दों ने ले लिया है।
निश्चय ही हिंदी भाषा में पहले देशज-विदेशज,तत्सम-तद्भव शब्दों का मिश्रण रहा है किन्तु आज की स्थिति तो इतनी दयनीय हो चुकी है कि जब कभी मैं बच्चों के अतिरिक्त बड़े-बड़े उच्च शिक्षित M.A.-Ph.d. डिग्री धारकों को भी देखता हूँ तो मेरा ह्रदय हिंदी की दुर्दशा पर क्रंदित हो उठता है.
बड़ी लज्जा आती है जब इतने पढ़े-लिखे लोगों को मौका मिलने पर वे एक पन्ना भी शुद्ध रूप से नहीं लिख पाते।विश्वास मानिये ये हालत देश के प्रतिष्ठित एवं संभ्रांत अध्यापकों, प्राध्यापकों के अतिरिक्त ख्यातिलब्ध राजनेताओं तथा पत्रकारों की भी हो चुकी है।
सधन्यवाद,
आपका भाई,
मुकुंद हरि
Monday, July 14, 2008
The Bhagwadgeeta :-
- Neither the weapons can destruct it, nor the fire can burn it. The water can not make it wet and not even the wind can make it fly.
This is the definition of our soul 'AATMA' in Bhagwadgeeta which is supposed to be directly chanted by Shri Bhagwan himself. So, it proves that our soul is immortal because it is the integral part of God. The only thing is it changes its form by taking different births in the form of human, animal or plants. So, whatever is alive in the world is part of God since it possesses the 'Atma-Tatwa'. And the soul takes rebirth after the death of every former body. Hence, our bodies are mortal but the soul is always alive.
