देश की स्वतंत्रता के ६३ वर्षों के बाद भी हिंदी को आज तक राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा तो ना ही मिल सका अपितु इसकी भाषागत परिपाटी एवं शुद्धता का ह्रास उत्तरोत्तर होता ही जा रहा है.यह न केवल इस देश का दुर्भाग्य है वरन देशवासियों के लिए भी लज्जा का विषय होना चाहिए.आज हमारे बच्चे न केवल हिंदी की गिनतियाँ,पहाड़े भूलते जा रहे हैं बल्कि अब तो उनके लिए नारियल, हाथी,सप्ताह,महीने आदि के साथ-साथ सामान्य हिंदी के शब्द एवं संज्ञा आदि का स्थान भी अंगरेजी के Coconut, Elephant, Sunday,Monday...,January, February जैसे शब्दों ने ले लिया है।
निश्चय ही हिंदी भाषा में पहले देशज-विदेशज,तत्सम-तद्भव शब्दों का मिश्रण रहा है किन्तु आज की स्थिति तो इतनी दयनीय हो चुकी है कि जब कभी मैं बच्चों के अतिरिक्त बड़े-बड़े उच्च शिक्षित M.A.-Ph.d. डिग्री धारकों को भी देखता हूँ तो मेरा ह्रदय हिंदी की दुर्दशा पर क्रंदित हो उठता है.
बड़ी लज्जा आती है जब इतने पढ़े-लिखे लोगों को मौका मिलने पर वे एक पन्ना भी शुद्ध रूप से नहीं लिख पाते।विश्वास मानिये ये हालत देश के प्रतिष्ठित एवं संभ्रांत अध्यापकों, प्राध्यापकों के अतिरिक्त ख्यातिलब्ध राजनेताओं तथा पत्रकारों की भी हो चुकी है।
क्या आप बता सकते हैं कि आज कितने कम लोग बचे होंगे जो शुद्ध रूप से हिंदी को पढ़, समझ एवं लिख सकें ? डॉक्टर हजारी प्रसाद द्विवेदी , कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी, महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, सुभद्रा कुमारी चौहान, हरिवंश राय बच्चन, कविवर निराला, पन्त, दिनकर जैसे लोग यदि आज जीवित होते तो निश्चय ही सम्प्रति हमारी इस प्रिय भाषा की दुर्गति पर अश्रुपात कर रहे होते।
इस दैनंदिन लेखन के पीछे मेरा एकमात्र यही उद्देश्य है कि जो भी हिंदी भाषा प्रेमी अपनी इस गौरवमयी भाषा के प्रति रंचमात्र भी प्रेम एवं गरिमा रखते हैं तो उन्हें निश्चय ही आगे आना होगा ताकि हम अपने प्रयासों से एक नवजागृति का सृजन कर सकें।
आपके सुझावों एवं मार्गदर्शन का मैं आकांक्षी रहूँगा।
सधन्यवाद,
आपका भाई,
मुकुंद हरि
सधन्यवाद,
आपका भाई,
मुकुंद हरि
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