Friday, February 15, 2013

मोदी नहीं बल्कि आडवाणी दे सकते हैं देश को बेहतर नेत्तृत्व.

नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार आज भले ही अपनी-अपनी पार्टियों के कद से ज्यादा बड़े हो चुके हों मगर लगातार सत्ता का उपभोग करने के कारण अब इनका व्यक्तित्व बहुत ही तानाशाही बन चुका है. दोनों अपने विरोधियों को मटियामेट करके ही दम लेते हैं और अपनी आलोचना इन्हें कतई पसंद नहीं. ऐसे में एनडीए को एक बार फिर से आडवाणी जैसे अनुभवी और अधिक स्वीकार्य नेता के बारे में सोचना चाहिए. देश के लिए भी उनका अनुभव और बदला हुआ मिजाज़ ज्यादा उपयोगी और सार्थक साबित हो सकता है क्योंकि विविध संस्कृतियों और धर्मों वाले इस देश के लिए कट्टर या तानाशाही प्रवृत्ति का नेत्तृव घातक हो सकता है. गुजरात और बिहार में विकास की आड़ में सत्ता की कुर्सी पर बैठकर अपने राजनीतिक विरोधियों और प्रतियोगियों को चुन-चुनकर ठिकाने लगाने की कला में ये दोनों ही कितने माहिर हैं इसका अंदाज़ इनके धुर विरोधियों और समर्थकों दोनों को है.
मेरी  ये सोच लंबे अरसे से रही है और अभी दो दिन पहले ही भाजपा के थिंक-टैंक रहे गोविन्दाचार्य ने भी ऐसा ही बयान देकर सियासतदानों में खलबली मचा दी है. सबसे बड़ी मुश्किल तो ये है कि खुद को सबसे अनुशासित और अलग पार्टी कहने वाली पार्टी यानि भाजपा खुद अपनी गुटबाजी से अभी तक उबर नहीं पाई है. गुटबाज़ी की शुरुआत में अटल-आडवाणी की पीएम पद को लेकर आपसी होड़ चर्चा में आई थी मगर अटल जी का ज़माना गुजरने के बाद पार्टी में अनुशासन का स्तर क्रमशः और गिरना शुरू हुआ और उनके बाद शीर्ष क्रम में पहले आडवाणी आये लेकिन पिछले लोकसभा चुनाव में उनकी अस्वीकार्यता के बाद पार्टी की दूसरी और तीसरी कतार के नेताओं ने भी अपना-अपना ग्रुप बनाकर खुद के लिए गोलबंदी शुरू कर दी.
वैसे  देखा जाये तो भाजपा के पुराने नेताओं के चुक जाने के बाद सबसे पहली दावेदारी सुषमा स्वराज की ही  बनती है मगर उनके प्रबल प्रतियोगी के रूप में खुर्राट वकील और राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष बने अरुण जेटली ने भी पीएम पद के लिए अपनी दावेदारी 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही शुरू कर दी थी. इंटरनेट पर खुद को 2014  के रूप में अपने समर्थकों के माध्यम से प्रोजेक्ट करके जेटली ने इशारों-इशारों में सुषमा और पार्टी को ये सन्देश दे दिया था कि उन्हें नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता. इन सब के बीच मुरली मनोहर जोशी की योग्यता और वरीयता कहाँ गुम हो गई ये किसी को पता भी नहीं चल पाया और पार्टी के इन तथाकथित युवा नेताओं ने उन्हें अपनी-अपनी प्रतिद्वंदिता में ख़ामोशी से किनारे कर दिया.
मामला अगर सिर्फ सुषमा और जेटली के बीच ही रहता तो भी कोई बात नहीं थी मगर गडकरी के बीजेपी अध्यक्ष बनने का वक़्त आते-आते राजनाथ सिंह का खेमा भी अपनी ताल ठोकनी शुरू कर चुका था. रही सही कसर गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद पूरी हो गई जब पार्टी की तीसरी कतार के नेता मुख़्तार अब्बास नकवी, राजीव प्रताप रूडी और रविशंकर प्रसाद तक की लॉबी ऑफ द रिकॉर्ड दबी जुबान से अपने-अपने गुट के नेताओं का अंतिम लक्ष्य प्रधानमंत्री बनना बताने लगी.
हालाँकि, ये बात भी दीगर है कि आज अगर बीजेपी के थिंक-टैंक और तेज-तर्रार नेता प्रमोद महाजन जीवित रहते तो निश्चित रूप से समीकरण कुछ और होता लेकिन वर्तमान में सच यही है कि पिछले 1-2 साल में पार्टी और युवाओं में नरेन्द्र मोदी जिस कदर सबसे पसंदीदा उम्मीदवार के तौर पर उभरे हैं उससे बीजेपी के हर स्तर के नेताओं और उनके समर्थकों के माथे पर शिकन काफी बढ़ गयी है और ये स्वाभाविक भी है. बरसों से सत्ता के शिखर पर बैठने की हसरत को जब कोई इतनी बड़ी चुनौती देगा तो दिल में टीस उठना स्वाभाविक है. वैसे भी गुजरात चुनाव के बाद खासतौर पर मीडिया ने जिस तरह से मोदी को जनता की सबसे ज्यादा पसंद का नेता घोषित किया है तबसे पार्टी के नेताओं की बेचैनी हाई-ब्लडप्रेशर की तरह बढ़ गई है.
एक तरफ मोदी का नाम आने से एनडीए में नीतीश के मोदी विरोधी रुख की वजह से जेडी (यू) बीजेपी को आँखें दिखा रही है वहीँ पार्टी को भी डर है कि अगर मोदी को पीएम के उम्मीदवार के तौर पर घोषित कर दिया गया तो न सिर्फ एनडीए में दरार आ सकती है बल्कि पार्टी खुद अगले चुनावों में भीतरघात का सामना कर सकती है क्योंकि पार्टी के अंदर मौजूद मोदी विरोधी ताकतें कभी मोदी को चुनाव जीतकर प्रधानमंत्री बनते नहीं देखना पसंद नहीं करेंगी. यही वजह है कि तमाम तैयारियों के बावजूद कुम्भ में मोदी का नाम घोषित न किया जाना ही पार्टी ने उचित समझा.
दूसरी  तरफ आज तक मन में प्रधानमंत्री न बन पाने का मलाल पाले बैठे आडवाणी हैं जो कम से कम अभी तक तो खुद को अंदरूनी तौर से चुका हुआ नहीं मान पा रहे. अपनी पिछली पाकिस्तान यात्रा में जिन्ना की मज़ार पर फूल चढ़कर और जिन्ना को असाम्प्रदायिक बताकर खुद की सेकुलर छवि पेश करने की आडवाणी की कोशिश यही दिखाने की थी कि जो मुस्लिम समाज उन्हें राम मंदिर और हिंदुत्व के मुद्दे को लेकर हार्डकोर हिंदुत्त्वावादी मानता आया है वो उनकी इस सेकुलर बनने की कोशिश में उनके नजदीक आये ताकि भविष्य में उनकी इस छवि बदलने की कोशिश से उन्हें फायदा मिल सके. ध्यान देने वाली बात ये है कि जिन्ना प्रकरण की वजह से आडवाणी को बीजेपी और संघ दोनों तरफ से कड़ी आलोचना झेलनी पड़ी थी मगर उनकी ये कोशिश भविष्य में उनके बहुत काम आ सकती है. गौरतलब है कि उक्त प्रकरण के बाद आडवाणी ने कोई मुस्लिम विरोधी बयान देने से गुरेज़ किया है और अन्य विवादित मुद्दों से भी खुद को दूर रखने की भरसक कोशिश की है जो आज तक कायम है. ये अपनी नयी छवि गढ़ने का ही तो तरीका है.
ऐसे में, राजनीति के इस खेल में कल को अगर नरेन्द्र मोदी के नाम पर एनडीए में फूट पड़ती है या चुनाव में पार्टी और गठबंधन को बहुमत के मुताबिक सीटें नहीं मिल पाती हैं और मोदी के नाम पर कोई दूसरा दल साथ देने को आगे नहीं आता है बीजेपी को अलग ही दांव चलना पड़ सकता है. ऐसे में पार्टी मोदी की कट्टर छवि को हटाकर उनकी जगह आडवाणी को उनके जिन्ना प्रकरण की बदौलत ज्यादा उदार छवि का और एक अनुभवी एवं योग्य उम्मीदवार के तौर पर पेशकर दूसरी पार्टियों की मदद लेकर सत्ता की चौखट को लांघने की कोशिश कर सकती है. वैसे भी जब कोई लकीर बड़ी दिख रही हो तो उसे छोटा करने के लिए उसके बगल में दूसरी ज्यादा बड़ी लकीर खींच दी जाये तो पहले वाली लकीर खुद ब खुद छोटी हो जाती है. कुछ यही हाल मोदी और आडवाणी के मुद्दे को लेकर भी नज़र आता है. 
मोदी आज की तारीख में कांग्रेस और दूसरे दलों की कृपा से इतने बड़े कट्टर और सांप्रदायिक छवि के नेता के रूप में घोषित किये जा चुके हैं कि बड़ी आसानी से उनकी जगह आडवाणी या किसी भी अन्य नेता को बीजेपी ज्यादा सेकुलर और उदारवादी चेहरे के रूप में पेश कर सकती है.
वैसे भी आज देश जिस तरह के कट्टरता और विरोध के माहौल की ओर जा रहा है उसमें मोदी या नीतीश जैसे नेता देश के लिए और ज्यादा नुकसानदेह हो सकते हैं, ऐसे में अपनी उम्र, अनुभव और नयी छवि की वजह से आडवाणी अगर अचानक से दावेदारों की दौड़ में नज़र आने लगें तो इसमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए...

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